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आलम – ए – इश्क

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सौरभ सैनी

ऊफ! ये आँखे...और आँखों की बातें,

 कैसे आखिर शब्दों में बयां रूं

 ऊफ! ये उस की महक और

 उस के होने का एहसास

 कैसे उस के पास ना होने पे यकीन करूं

 ऊफ!  ये हा और लमहे में उस की याद

 कैसे ना उस के फितूर को बयां रूं,

 ऊफ! ये बंद आंख और आंखों पे उस का ख्वाब

 क्यों आंखें खोल के उस को खुद से जूदा रूं

ऊफ! ये शाम…. और समंदर से मिलता हुआ सूरज

क्यों ना लहरों में उस के चेहरे का नूर लूं

ऊफ मेरी पागलों सी मोहब्बत और प्यार का ये हफ्ता

कैसे ना हर दिन खुशियों से उस की झोली भरूँ

खुदा दे ऐसा नूर शायरी में, कलम चले सूखे कागज़ पे और मेरे यार को अमर रूं