Home कविता शिद्दत

शिद्दत

949
19

कितना किया है तेरा इंतज़ार… ज़रा कभी ना झपकी हुई पलकों से पूछना।

क्या आलम था उस पल का… कभी गाल पे सूखे हुए अश्क से पूछना।

कितनी शिद्दत से तुझे रोकना चाहा… तेरे नाम से सूखे हुए लबों से पूछना।

क्या होता है अकेले रात का गुज़रना… मेरी कहानी सुनते उन तारों से पूछना।

दास्ताने इश्क का फलसफा इतना छोटा रहा… दिन तो पलों में गुज़र गए

जब लिखने चला कहानी तो अल्फाज़ जैसे सिमट गए।

क्या हश्र था तेरे चले जाने का… कभी कांपी हुई रूह से पूछना।

कितनी पाक थी मेरी मोहब्बत… कभी किताब में कैद उस सूखे फूल से पूछना

काफिर सा बन गया तू.. आज़ाद परींदा था, पैरों को लगाम लगा गया तू।

कितनी तड़प थी उस लमहे में… एक कतरे पानी से पूछना

क्या होता है अकेलापन ज़िन्दगी में… बिखरे हुए उस आशियां से पूछना।

वक़्त ज़िन्दगी का थम सा गया… रफ्तार क्या होती है…कभी तेरा लिया गया खयाल से पूछना

कितना किया है तेरा इंतजार… कुछ कहती आखरी सांसों से पूछना।

 

सौरभ सैनी (Saurabh Saini)