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आखिर हमें कहां लेकर जा रहा है आरक्षण

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देश की सबसे बड़ी पंचायत के सामने याचिका प्रस्तुत हुई है, जिसमें अनुसूचित जाति/ जनजाति से संबंध रखने वाली क्रीम लेयर को संविधान की धारा 15 और 16 के तहत मिलने वाले लाभों से हटाने की की अपील की गई है। याचिका में जोर देकर कहा गया है कि अनुसूचित जाति/ जनजाति को दिए जाने वाले आरक्षण का उद्देश्य पिछड़े वर्ग को समाज की मुख्य सामाजिक-आर्थिक धारा में लाना था लेकिन इन लाभों को इस वर्ग का छोटा समूह हड़प रहा है। सुप्रीम कोर्ट में दायर इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मुकद्दमे में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ के तहत आने वाली ‘क्रीमी लेयर’ की शिनाख्त हो चुकी है। लेकिन अनुसूचित जाति/ जनजातियों पर इस परिभाषा को अभी तक लागू नहीं किया गया है।

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हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में कुछ बदलाव भी किये हैं, जिसके बाद आरक्षण का मुद्दा अखबारों, टीवी चैनलों की सबसे बड़ी सुर्खी बन गया है। सोशल मीडिया में तो आरक्षण को लेकर चल रहे पोस्ट की बाढ़ सी आ गयी है। कोई इसे सामाजिक समरसता और उत्पादन के समान वितरण का आधार तो कोई इसे सामाजिक-आर्थिक संतुलन को बिगाड़ने वाले कारक के रूप में देख रहा है। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण लाने के पीछे उद्देश्य था कि भारतीय समाज में दबे-कुचले तबके को मुख्यधारा में लाया जाये। आजादी के बाद देश की संविधान सभा ने इसे मात्र 10 वर्षों के लिए लागू किया था। और अब जब देश आरक्षण के साथ लगभग 70 वर्षों की यात्रा कर चुका है, तो इसे हटाना तो दूर बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन का रूप ले चुका है। समाज के संपन्न तबके जैसे जाट, गुज्जर, पटेल, पाटीदार खुद को पिछड़े वर्गों में शामिल कराने और आरक्षण का लाभ पाने वाली जातियों में अनुसूचित होने के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रही हैं। हरियाणा में जाट ओबीसी में आरक्षण मांग रहे हैं। इसके लिए हिंसक आंदोलन भी हो चुका है। खट्टर सरकार जाटों सहित 5 जातियों को आरक्षण दे चुकी है। हालांकि मामला अभी सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन है। गुजरात में पाटीदार यानी पटेल समुदाय के लोग ओबीसी के तहत आरक्षण की मांग कर रहे हैं। इसके लिए वे बड़ा आंदोलन भी कर रहे हैं। हालांकि सरकार पाटीदारों को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं है। महाराष्ट्र में भी आरक्षण की आग जब तब उठती रही है। वहां मराठा अब ओबीसी आरक्षण की मांग कर रहे हैं। मराठा क्रांति मोर्चा आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है।
आलम यह है कि बिना इसके लाभ-हानि का मूल्यांकन किये हुए अगर कोई राजनीतिक पार्टी का कोई नेता इसे हटाने या इसमें छेड़छाड़ का बयान भी जारी कर देता है तो खुद उस पार्टी के सामने सत्ता से बेदखल होने का खतरा पैदा हो जाता है। हालात ऐसे हैं कि मामले में आरक्षण को लेकर एक भीड़तंत्र की स्थिति पैदा हो गयी है, कोई इसकी खामियां गिनाने तो कोई इसमें फायदे गिनाने में लगा हुआ है। आरक्षण का तंत्र क्या है, इससे किसको फायदा हो रहा, किसको नुकसान, इसमें क्या संशोधन हो सकते हैं, इसको कितने समय तक लागू रखा जाये, इसको लेकर कोई चर्चा ही नहीं करना चाहता। कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि आरक्षण के वर्तमान तंत्र से मार्क्स के साम्यवाद का लक्ष्य साधने का प्रयास किया जा रहा है या लोहिया/जेपी के समाजवाद का।
जिस सवर्ण युवा को सरकारी नौकरी नहीं मिलती उसके पास अपनी अयोग्यता और अकौशल को छिपाने का बेहतरीन औजार मिल जाता है और जो पढ़ा-लिखा दलित युवा अपनी योग्यता से समझौता करते हुए निचले दर्जे के किसी रोजगार में लगा हुआ है, उसके पास कोई बहाना नहीं है। कमाल की बात है जिस आरक्षण ने इतने दंगे कराये, इतना बवाल मचाया, वह आरक्षण न तो सवर्ण और न ही दलित किसी को भी सामंतवाद, भाग्यवाद, परिवारवाद, अंधविश्वास के अंधे कुएं से बाहर नहीं निकाल सका। इतने सालों बाद में देश की मलिन बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग दलित और पिछड़े समुदाय से ही मिलेंगे। वहीं उत्तर-पूर्व में अनुसूचित जनजाति से आने वाले तमाम ऐसे परिवार जो चाय बागानों के मालिक हैं, बाकायदा आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। राजस्थान की संपन्न मीणा जाति के लोग अनुसूचित या आदिवासी वर्ग का फायदा लेकर उच्च सरकारी पदों पर काबिज हैं। वहीं दूसरी ओर उत्तर भारत में तमाम ऐसे सवर्ण परिवारों के लोग दयनीय जीवन जीने को विवश हैं।


आजादी के बाद से ही अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए 22.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर दी गयी थी। शुरुआत में इसे 10 वर्षों के लिए लागू किया गया था, जिसकी बाद में समीक्षा के आधार पर बढ़ाने का प्रावधान किया गया था। लेकिन अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) को आरक्षण एक लंबे आंदोलन के बाद हासिल हो सका।

 

आरक्षण का इतिहास

  • अब सवाल यह पैदा होता है कि इतनी बेहतरीन प्रणाली जिसका उपयोग देश में सामाजिक-आर्थिक तानेबाने को मजबूत करने के लिये होना चाहिए वो राजनीतिक स्वार्थों को पूरा करने का सिर्फ एक टूल बनकर रह गयी है। कहां कमी रह गयी है इस पर चर्चा करने से पहले डालते हैं इसके इतिहास पर एक नजर।
    देश में आजादी से पहले ही आरक्षण का प्रावधान हो गया था। तमिलनाडु में अंग्रेजों और ने महाराष्ट्र में शाहू जी महाराज ने अपनी रियासत कोल्हापुर में आरक्षण की व्यवस्था लागू की थी।
  • 1894 में, जब शाहूजी महाराज ने राज्य की बागडोर संभाली थी, उस समय कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे। इसी प्रकार लिपिक पद के 500 पदों में से मात्र 10 पर गैर-ब्राह्मण थे। 1902 के मध्य में शाहू जी महाराज ने इस गैरबराबरी को दूर करने के लिए देश में पहली बार अपने राज्य में आरक्षण व्यवस्था लागू की। एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिये।
  • महाराज के इस आदेश से ब्राह्मणों पर तो जैसे गाज गिर गयी। शाहू जी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के बाद 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या सिर्फ 35 रह गई थी। महाराज ने कोल्हापुर नगरपालिका के चुनाव में अछूतों के लिए भी सीटें आरक्षित की थी। इसका असर भी दिखा देश में ऐसा पहला मौका आया जब राज्य नगरपालिका का अध्यक्ष अस्पृश्य जाति से चुन कर आया था।
    1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए 8 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था।
  • अंग्रेजों ने सेना में महार जाति को आरक्षण दिया था, इससे सेना में क्षत्रियों का वर्चस्व समाप्त हो गया।

  • 24 सितंबर 1935 को यरवदा जेल में गांधी-अंबेडकर के बीच हुए पूना पैक्ट में दलित वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 और केंद्रीय विधायिका में कुल सीटों की 18 प्रतिशत करा ली थी। इसके बदलों में अंबेडकर ने अछूतों के लिए 2 वोटों के अधिकार का त्याग कर दिया था, जो उन्हें मैकडोनाल्ड अवार्ड या कम्यूनल अवार्ड से मिला था।
  • इसके बाद 1935 से पूर्व ब्रिटिश शासन में ‘डिप्रेस्ड क्लास’ नाम से सामाजिक रूप से पिछड़ी और दलित जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था थी।
  • आजादी के बाद संविधान के अनुच्छेद 330 के तहत अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए नौकरियों और 332 के तहत राजनीति में जनसंख्यानुपात में आरक्षण की व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 340 में सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आयोग बनाने का उल्लेख किया गया।
  • आजाद भारत में आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक कम राजनीतिक अधिक रही है। इसकी नींव ही चुनावी फायदों के लिए रखी गयी।
देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1953-55 में काका कालेलकर आयोग का गठन किया था। इसने अन्य पिछड़ी जातियों के लिए 40 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश दी थी। लेकिन बाद में उन्होंने अपनी ही रिपोर्ट में आपत्ति जता दी और आरक्षण लागू नहीं हो सका। जानकारों का कहना है कि तत्कालीन सरकार और विभिन्न वर्गों का उनपर जबर्दस्त दबाव था।

 

  • तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने 1979 को मंडल कमीशन का गठन उस समय किया जब जनता पार्टी आंतरिक कलह से जूझ रही थी। 23 दिसंबर 1979 को चौधरी चरण सिंह की एक रैली होने वाली थी। उनकी रणनीति थी कि इससे चरण सिंह का जनाधार कमजोर हो जायेगा और पिछड़ी जातियों का मजबूत वोटबैंक उन्हें प्राप्त हो जायेगा।

  • मंडल आयोग ने 1981-82 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी। लेकिन इस सार्वजनिक नहीं किया गया। हालांकि इसके लिए आंदोलन होते रहे और सरकार पर दबाव बढ़ता रहा।
  • मंडल आयोग के रिपोर्ट में पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की बात की गई। भारत में अनुसूचित जाति-जनजाति को पहले से 22.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा था। इसी कारण इंदिरा गांधी की सरकार इस सिफारिश को लागू करने से बचती रही। मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करने का मतलब था 49.5 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर देना। तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार इसे लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं जुटा सकी।

  • 1985-86 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने इसे सार्वजनिक कर दिया लेकिन लागू नहीं किया। चुनाव में जनता दल के घोषणापत्र में इसे लागू करने का वादा किया गया। सरकार बनने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उनके सहयोगी देवीलाल के बीच मतभेद शुरू हो गये। देवीलाल जनता दल छोड़ने की तैयारी में थे। वीपी सिंह ने 1990 में देवीलाल के असर को कम करने के लिए मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा कर दी। लेकिन देश में आरक्षण विरोधी आंदोलन शुरू हो गये। अब वीपी सिंह को सवर्ण वोट बैंक खिसकने का डर पैदा हो गया। मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया। कोर्ट ने आरक्षण पर स्टे लगा दिया। स्टे लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रंगनाध मिश्र को 2 दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। बाद में नरसिम्हाराव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी और सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण से स्टे हटाकर इसे लागू कर दिया।

    इन मुद्दों पर विचार करने की जरूरत

  • मंडल कमीशन की सिफारिश के आधार पर अन्य पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई, हालांकि उनकी आबादी कुली आबाद की 52 फीसदी मानी जाती है। इसे अन्य पिछड़ी जातियों ने नैसर्गिक न्याय के प्रतिकूल बताया। क्योंकि एससी और एसटी को उनकी जनसंख्या के बराबर आरक्षण की व्यवस्था दी गई, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर 52 प्रतिशत ओबीसी को मात्र 27 प्रतिशत आरक्षण ही दिया गया। और आज की वर्तमान स्थिति यह है कि एससी को 15 प्रतिशत, एसटी को 7.5 प्रतिशत, ओबीसी को 27 यानि कुल 49.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। बाकी 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग के साथ इन तीनों वर्गों के लिए भी खुला है। सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के तहत आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता लेकिन तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, उड़ीसा, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र आदि राज्यों में 2 या 2 से अधिक उपवर्ग बनाकर आरक्षण दिया जा रहा है। केरल, बिहार, आंध्रप्रेश, कर्नाटक, पंजाब में अनुसूचित जातियों को भी 2 या 4 वर्गो में बांटकर अलग-अलग आरक्षण है। तमिलनाडु में 68 प्रतिशत, कर्नाटक में 62 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 73 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है और राजस्थान सरकार ने आरक्षण कोटा बढ़ाते हुए 68 प्रतिशत करने का विधेयक विधानसभा में पारित किया है।आरक्षण के प्रावधान के इतने साल बाद भी यह बहस अपने परिणाम पर नहीं पहुंच सकी है कि आरक्षण प्रतिनिधित्व का माध्यम है या गरीबी दूर करने का टूल। क्योंकि एस और एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से वंचित कर अन्य दबे-कुचले लोगों को दिये जाने का फार्मूला इसी बहस से ही होकर निकलेगा। क्योंकि अगर आरक्षण को प्रतिनिधित्व का माध्यम माना जाये तो क्रीमी लेयर की बात करना बेमानी होगा क्योंकि इससे शिक्षित संपन्न पिछड़ों के हाथ से प्रतिनिधित्व का अवसर समाप्त हो जायेगा, लेकिन अगर इसे गरीबी दूर का का टूल के रूप में लिया जाये तो ओबीसी की तरह एससी/एसटी वर्गों में क्रीमी लेयर को इस लाभ से वंचित करना पड़ेगा तभी अन्य जरूरतमंदों तक इसे पहुंचाया जा सकेगा।

    आरक्षण अब किसे दिया जाये

हालांकि इस तथ्य को भी स्वीकार करना होगा कि आरक्षण रोजगार का विकल्प नहीं हो सकता। यह सिर्फ प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी के मामले तक सीमित है। देश में बेरोजगारों की संख्या करोड़ों में है अगर सभी सरकारी रिक्त पदों को भर भी दिया जाये तो कुछ लाख पद ही भरे जा सकते हैं। जबकि हालात ये हैं कि अगर कहीं चपरासी के पद के लिए भी नियुक्ति जारी होती है तो पोस्ट ग्रेजुएट से लेकर पीएचडी धारक तक आवेदकों की लिस्ट में खड़े हो जाते हैं। दूसरा पहलू यह है कि अगर आरक्षण को खत्म कर दिया जाये तो भी सभी को नौकरी नहीं मिल सकती। इस वजह से इसे सिर्फ हिस्सेदारी के रूप में ही लिया जाये तो बेहतर। लेकिन इस हिस्सेदारी में एक इमानदारी और पारदर्शिता की भी जरूरत है। इस सीधा सा सिद्धांत है कि जिसे अब तक अवसर नहीं मिला है उसे अवसर दो और जिसने एक या दो बार इस अवसर का लाभ उठा लिया है उसे हटाकर अब उसे अवसर दो जिसे अभी तक नहीं मिला है।

लोहिया, कर्पूरी ने की स्थिति को बदलने की कोशिश

मनोहर लोहिया ने अपने विचारों और बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने अपने निर्णयों से इस दिशा में कुछ बदलाव लाने की कोशिश की थी। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस दिशा में काम किया था। कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरीलाल आयोग की स्थापना की थी। उस आयोग ने राममनोहर लोहिया की विचारधारा को अपना आधार बनाया। लोहिया 60 फीसदी आरक्षण देना चाहते थे। उनकी नजर में दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग और सभी महिलाएं पिछड़ों में आती थीं। इस वजह से कर्पूरी ठाकुर ने महिलाओं को भी आरक्षण दिया। उन्होंने ओबीसी को 2 भागों में वर्गीकृत किया। पहले वर्ग में वे लोग शामिल किये गये जिनके पास जमीन थी, लेकिन वे सामाजिक तौर पर पिछड़े हुए थे। उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह ने भी इसी फार्मूले को आधार बनाकर आरक्षण दिया था। यह कमजोर को ताकतवर बनाने की कोशिश थी। तब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और कोर्ट ने भी आरक्षण के लिए पिछड़ों की 2 भूमियुक्त और भूमिहीन श्रेणियां बनाने की सिफारिश की। लेकिन कालांतर में यह फार्मूला राजनीति की भेंट चढ़ गया। इसे बिहार में लालू प्रसाद यादव और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने खत्म कर दिया और दोनों ने ही अपने-अपने प्रदेशों में इस व्यवस्था का प्रयोग एक जाति विशेष को लाभ पहुंचाने, उसे मजबूत करने और अंत में अपने वोटबैंक को पोषित करने के लिए किया।

आ रहे हैं आरक्षण को लेकर ये सुझाव

समय-समय पर समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और अन्य बुद्धिजीवी वर्ग की ओर से इस प्रकार के सुझाव आते रहते हैं कि जिन लोगों को आरक्षण मिल चुका है उनकी दूसरी पीढ़ी को आरक्षण न मिले। यह सुविधा अधिकतम 2 पीढ़ियों तक ही दी जाये। दूसरा सुझाव यह है कि जो इन वर्गों में भी उन्हें ही आरक्षण दिया जाये तो वास्तव में गरीब या जरूरतमंद हैं। ओबीसी में क्रीम लेयर तय कर दी गयी है, लेकिन एससी/एसटी में ऐसा किया जाने पर चर्चा चल रही है।

इन प्रकार के आरक्षणों पर भी विचार करने की जरूरत

  • देश में नौकरी के लिए सिर्फ जातिगत आधार पर आरक्षण ही नहीं, बल्कि अन्य प्रकार के आरक्षण हैं जो देश के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो रहे हैं लेकिन इनपर पर्याप्त चर्चा नहीं हो रही। पहला प्रकार है पूंजीगत आरक्षण। जिसमें एक पूंजीपति अपनी संतान को पैसे के दम पर उन्नत शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश दिला देता और पैसे के दम पर ही संस्थान खोल देता है। जैसे कि निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में अयोग्य लोग डोनेशन देकर लाखों रुपए खर्च कर दाखिला लेते हैं और बाद में अस्पताल या इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट खोल देते हैं। अब उनके संस्थान से या उन लोगों से समाज का कितना भला होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। अगर यह तर्क दिया जाता है कि जातिगत आरक्षण लेकर निकले लोग योग्य नहीं होते तो पूंजी के दम पर डिग्री पाये और संस्थान चला रहे लोग कैसे योग्य हो सकते हैं।
  • दूसरा है प्रमोशन में आरक्षण है। यह फार्मूला समाज का भला कम बुरा ज्यादा कर रहा है। पहले तो उस व्यक्ति ने नौकरी पाने में आरक्षण का लाभ लिया, फिर प्रमोशन में आरक्षण लेकर अपनी स्थिति को और मजबूत कर रहा है, जबकि आरक्षण का शुरुआती उद्देश्य नौकरियों में प्रतिनिधित्व देना था न कि मजबूत को और मजबूत बनाना। इससे कर्मचारियों में आपसी तौर पर नकारात्मक माहौल पैदा होता है और योग्य व्यक्ति की उत्पादकता में कमी आती है।

    ये पैदा हो रही है समस्या

    अब आरक्षण को लेकर जो माहौल बन रहा है वह देश को विध्वंश की ओर लेकर जा रहा है। असामाजिक और अराजक तत्व लोगों को आरक्षण के खिलाफ भड़काकर उन्माद का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ लोग यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग का हर व्यक्ति अयोग्य है। जबकि हकीकत यह है कि आरक्षण योग्यता को खत्म नहीं कर रहा है। अनुसूचित जाति से आईएएस टॉपर निकल आ रहे हैं। विज्ञान के क्षेत्रों में भी वे खुद को साबित कर रहे हैं।

    गांधी और अंबेडकर दोनों की समझने की जरूरत

    दरअसल आज के दौर में आरक्षण की दशा-दिशा पर विचार करने से पहले गांधी और अंबेडकर दोनों की विचारधारा को समझने की जरूरत है। गांधी जहां पारंपरिक व्यवस्था के तहत ही दलितों का उत्थान चाहते थे वहीं अंबेडतकर पृथकतावादी थी। पूना पैक्ट में जहां अंबेडकर दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल और 2 वोट के अधिकार के फार्मूले से उन्हें समाज की धारा में लाना चाहते थे, वहीं गांधी ने इसके विरोध में भूख हड़ताल की। गांधी का मानना था पारंपरिक व्यवस्था में ही दलितों/अछूतों को आरक्षण देकर उनका उत्थान किया जा सकता है। अगर देश में दलितों और आरक्षण के खिलाफ ऐसा ही उग्र माहौल बनता रहा तो मुमकिन है कि फिर से उनके लिए अलग निर्वाचन मंडल जैसी मांगे उठने लगें और यह स्थिति देश अलगाव के रास्ते पर ले जायेगी। बेहतर यही होगा कि गांधी के नाम का सहारा लेकर राजनीति करने वाली कांग्रेस पार्टी, अंबेडकर को सर्वाधिक सम्मान देने का दावा करने वाली भाजपा, पिछड़ों की झंडाबरदार पार्टियां जैसे समाजवादी, बहुजन समाज पार्टी सभी मिल कर बैठें और कमजोर को सशक्त बनाने की यांत्रिकी तैयार करें, न कि देश को अलगाव के रास्ते पर ढकेला जाये। क्योंकि शायद 1932 में अंबेडकर अपने मंसूबों में कामयाब हो गये होते तो कोई बड़ी बात नहीं थी कि 1947 आते-आते देश में धर्म के अलावा जाति के आधार पर भी देश के बंटवारे की मांग उठ गयी होती और अब तक इसे विभाजित कर प्रथक दलित/अछूत लैंड का निर्माण करना पड़ गया होता। जरूरत है तो गांधी को फिर से पढ़ने की और ठीक से समझने की।


मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद से क्षेत्रीय पार्टियां वोट बैंक के लिए कुछ विशेष जातियों को फायदा दिलाने में लगी हुई हैं। समय आ चुका है कि इसकी मूल परिभाषा पर फिर से चर्चा की जाये। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के उपायों पर चर्चा की जाये। मालूम है कि इसका मैकेनिज्म बनाने में बहुत ऊर्जा लगेगी, बहुत धन खर्च होगा लेकिन विभाजन, अलगाव के दंश से तो यह बेहतर ही होगा।