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आखिर कहां से आती है रैलियों में भीड़

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rahul rally (file photo)

political rallies पर कुछ चर्चा करते हैं।

Nitin

वैसे तो देश में पूरे वर्ष कहीं न कहीं चुनाव (election) का माहौल बना रहता है लेकिन लोकतंत्र का सबसे बड़ा दंगल यानि लोकसभा चुनाव (Loksabha election) की आहट भी सुनाई देने लगी है। रैली में हुई भाषणबाजी, आरोप-प्रत्यारोप के बाद सबसे ज्यादा अगर किसी चीज पर चर्चा होती है तो वह है वहां पहुंची भीड़ (crowd)। रैली (political rallies) करने वाली पार्टी उसी आयोजन में आमजन और कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ दिखाकर रैली की बुलंदियों के दावे ठोकती हैं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां (opposition parties) उसी रैली (political rallies) में खाली पड़ी कुर्सियां दिखाकर उसे असफल और फीका साबित करने का दावा करती हैं। यहां पर फर्क होता है तो बस देखने वाले की दृष्टि का वह उस रैली में क्या देखता है।

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amit shah rally (file photo)

अभी हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित कांग्रेस की जनाक्रोश रैली इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। जहां कांग्रेस इसमें लाखों की भीड़ और इसकी सफलता के बड़े-बड़े दावे कर रही है वहीं दूसरी ओर विरोधी पार्टी भाजपा (BJP) ने यहां खाली पड़ी कुर्सियों के फोटो सोशल मीडिया पर वायरल किये। खैर, भारतीय राजनीतिक परिदृश्य (indian political system) में अब यह बात कोई नयी नहीं रह गयी है। प्रत्येक राज्य, प्रत्येक राजनीतिक दल (political party) और प्रत्येक चुनाव में इस तरह की चीजें सामने आ रही हैं। देखें journalistgym.com की website.

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political rallies में अपने नेता को सुनने आते हैं लोग

अब सवाल यह पैदा होता है कि रैलियों (political rallies) में आखिर यह भीड़ आती कहां से है। क्या वाकई में देश की जनता अपने प्रिय नेता को देखने/सुनने के लिए व्याकुल रहती है। व्यवहार में अब ऐसा नहीं रह गया है। ताऊ देवी लाल (tau devi lal) और ओमप्रकाश चौटाला (om prakash chautala) की रैलियों के दिन बीत चुके हैं, जब इनके समारोह (political functions) में पहुंची लोक संख्या गिनीज रिकार्डों (guinness records) का हिस्सा बनती थी। दरअसल रैलियों में पहुंचे लोग अब प्रलोभन देकर लाये जाते हैं। और रैलियों व समारोहों में भीड़ जुटाने का जिम्मा दिया जाता है उस पार्टी से टिकट पाने की इच्छा रखने वाले टिकटार्थी (political aspirants) से। इस कार्य की सार्थकता से जहां टिकटार्थी को अपनी योग्यता साबित करने का मौका मिल जाता है, वहीं रैली में भीड़ लाकर वह अपने पराक्रम (political ability) को साबित करता है। यह ठीक उसी तरह से जैसे एक विद्यार्थी परीक्षा में कितने अधिक प्रश्नों का सही उत्तर देता है।
यहीं से पड़ती है गुटबाजी (cliquish) की नींव। अलग-अलग गुटों से आयी भीड़ खुद को पगड़ियों, पोस्टरों से अपने अस्तित्व और मजबूती को दिखाने की कोशिश करती है। दरअसल, यह एक तरह से राजीनिति का कारपोरेटाइजेशन (corporatization) है। जो जितनी भीड़ लाया वह उतना बड़ा नेता (political leader) और उसको टिकट (party ticekt) मिलने की उतनी अधिक संभावना। चाहे वह भीड़ पैसे देकर लायी गयी हो या शराब बांटकर। बस किसी तरह से भीड़ जुटानी है। जब राजनीति का आधार भीड़ बन जाये तो लोकतंत्र (democracy) किस तरफ दौड़ने लग जाता है यह समझना कोई मुश्किल पहेली नहीं है।
हालांकि हाल की पराजयों, पराभवों से सीखकर कुछ पार्टियां एक समूह को अलग दिखाने पर रोक लगाने की कोशिश कर रही हैं। आरक्षण (reservation) के मुद्दे को इन political parties ने अपना प्रमुख हथियार बना लिया है।

Indian political system में अब तक इस तरफ किसी ने भी ध्यान नहीं दिया है। इस वजह से राजनीति के स्तर में गिरावट आ रही है।