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विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign exchange reserves) 426 अरब डॉलर के पार

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विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign exchange reserves) 426 अरब डॉलर के पार
देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार चौथे सप्ताह बढ़ता हुआ पहली बार 426 अरब डॉलर के पार पहुंच गया। यह अब तक सबसे बड़ा रिकार्ड (record) है। इसमें सबसे ज्यादा योगदान विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति (Foreign exchange asset) का रहा। 13 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में 1.20 अरब डॉलर बढ़कर 400.98 अरब डॉलर पर पहुंच गई। यह पहली बार है जब विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति 400 अरब डॉलर के पार पहुंची है। इस दौरान स्वर्ण भंडार 21.48 अरब डॉलर पर स्थिर रहा। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास आरक्षित निधि 89 लाख डॉलर बढ़कर 2.08 अरब डॉलर पर और विशेष आहरण अधिकार 66 लाख डॉलर की वृद्धि के साथ 1.54 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
क्या होता है विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign exchange reserves), क्या हैं इसके फायदे

Foreign exchange reserve का analysis

भारत के विदेशी पूंजी भंडार के रिकार्ड स्तर पर पहुंचने के बाद एक विश्लेषण
देश के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार 5वें सप्ताह वृद्धि दर्ज हुई है और 12 जनवरी को समाप्त सप्ताह में 2.70 अरब डॉलर बढ़कर यह 413.83 अरब डॉलर के अब तक के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले 05 जनवरी को समाप्त सप्ताह में यह 1.76 अरब डॉलर की बढ़त के साथ 411.12 अरब डॉलर पर रहा था। सप्ताह में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास आरक्षित निधि 93 लाख डॉलर बढ़कर 2.05 अरब डॉलर और विशेष आहरण अधिकार 62 लाख डॉलर बढ़कर 1.52 अरब डॉलर पर पहुँच गया।
क्या है विदेश मुद्रा भंडार (Foreign exchange reserves) :
विदेशी मुद्रा भंडार देश के केंद्रीय बैंक यानि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा संचित किया हुआ विदेशी मुद्राओं का भंडार होता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग उस देश की मुद्रा को विकसित देश की मुद्राओं के मुकाबले में मजबूत बनाये रखना है। उदाहरण के लिए भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 400 डॉलर से ऊपर है और भारतीय रुपए की कीमत 64 रुपए के आसपास है और पाकिस्तान (Pakistan) का विदेशी मुद्रा भंडार मात्र 14 अरब डॉलर के आसपास है और एक डॉलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपए का मूल्य 110 डॉलर के आसपास है।

कहां से आती है और क्या है विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग

देश को विदेशी मुद्रा देश के निर्यातकों (exporters) के माध्यम से प्राप्त होती है, वे इसे बैंकों में जमा कराते हैं। इसके बदले में बैंक उस निर्यातक को स्थानीय मुद्रा जारी कर देता है बैंक इस विदेशी मुद्रा को रिजर्व बैंक के पास ट्रांसफर कर देते हैं।
निर्यातकों (exporters) के सहुलियत देने के लिए होता है इसका उपयोग :
विदेशी मुद्रा के द्वारा कोई देश अपनी स्थानीय मुद्रा से किसी दूसरे विकसित देश की मुद्रा जैसे डॉलर, पौंड (Pound) या यूरो (Euro) आदि खरीदता है। इससे उस विकसित देश (developed country) की मुद्रा के दाम में बढ़ोतरी होती है। जैसे भारत अगर अमेरिकी डॉलर (US dollar) खरीदता है तो रुपए (Indian Rupee) के मुकाबले के डॉलर की वैल्यू बढ़ने लगती है। इसका फायदा देश के निर्यातकों को मिलता है। निर्यातकों के अपने उत्पाद के बदले अधिक डॉलर प्राप्त होते हैं और अमेरिका (US) के मुकाबले उस उत्पाद का मूल्य कम हो जाता है, जिससे निर्यातक (Exporter) को वहां अपनी बिक्री बढ़ाने में मदद मिलती है। यही वजह है कई देश जैसे चीन (China) और जापान (Japan) अपनी मुद्राओं (Currencies) का मूल्य डॉलर के मुकाबले कम रखने का प्रयास करते हैं, जिससे उनका निर्यात अपेक्षाकृत सस्ता रखने, व्यापार को मजबूत रखने और आर्थिक स्थिति को बेहतरीन रखने में मदद मिलती है। लेकिन भारत के लिए यह सौदा घाटे का होता है, क्योंकि उसे अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत पेट्रोलियम (petroleum), मशीनरी (machinery), रक्षा साजो-सामान (defence equipments) और प्रौद्योगिकी (technologies) विदेशों से खरीदना होती है और उसका भुगतान डॉलर या अन्य विदेशी मुद्रा में किया जाता है। अगर डॉलर के मुकाबले रुपया ज्यादा सस्ता हो जाता है तो उसे उत्पाद के बदले ज्यादा पूंजी खर्च करनी पड़ती है। और देश का व्यापारिक घाटा बढ़ने लगता है।

आपातकाल (emergency) में खर्च के लिए पूंजी का प्रवाह बनाये रखना

सबसे महत्वपूर्ण कारण है आर्थिक आपात के समय देश के ‍‍खर्चों के लिए पूंजी के प्रवाह को बनाये रखना। जैसे कि अगर भूकंप, ज्वालामुखी, युद्ध आदि के कारण अगर निर्यातक (exporter) किसी अन्य देश को सप्लाई देने में असमर्थ हो जाएं तो उस स्थिति में केंद्रीय बैंक जमा विदेश मुद्रा को स्थानीय मुद्रा में तब्दील कर देता और आयात के लिए पूंजी की कमी नहीं होने पाती।

महंगाई को नियंत्रित रखने

केंद्रीय बैंक (central banks) देश में बाजार को संतुलित रखने के लिए भी विदेशी पूंजी का इस्तेमाल करता है। यह महंगाई (Inflation) को नियंत्रित रखने और स्थानीय पूंजी की वैल्यू (value of capital) को नियंत्रित रखने के लिए उसे खरीदता है।

विदेशी निवेशकों के भरोसा देने में

देश में आर्थिक और राजनीतिक असुरक्षा (economica and political insecurity) के समय केंद्रीय बैंक विदेशी निवेशकों को उनकी देश में निवेशित पूंजी की सुरक्षा का भरोसा देता है। आर्थिक आपातकाल के समय यह विदेशी पूंजी देश की अर्थव्यवस्था (economy) को सहारा देती है।

सरकारी उपक्रमों को रिकैपिटलाइज (recapitalize) करने में

कुछ देश अपने उपक्रमों में निवेश करने के लिए भी विदेशी पूंजी का इस्तेमाल करते हैं। जैसे चीन अपने कुछ सरकारी बैंकों को रीकैपिटलाइज करने के लिए विदेशी जमा भंडार का प्रयोग करता है।
किसी भी देश के पास कम से कम अपने 3 से 6 माह के आयात बिलों को पूरा करने के लिए विदेशी पूंजी भंडार (foreign exchange reserve) होना चाहिए। इस देश में भोजन या अन्य जरूरी सामान की कमी होने से स्थितियां अनियंत्रित नहीं होतीं। वर्ष 2015 में ग्रीस ऐसा नहीं कर सका था और वहां आर्थिक सामाजिक आपात की स्थितियां पैदा हो गयी थीं। कुल मिलाकर जिस देश के पास जितना बड़ा विदेशी पूंजी भंडार (foreign exchange reserve) होता है वह आपातकाल (emergency) की स्थितियों को उतनी ही बेहतरीन तरीके से प्रबंधित कर पाता है।

इन देशों का विदेशी पूंजी भंडार

चीन : 3010 अरब डॉलर, जापान : 1233 अरब डॉलर, यूरोपीयन यूनियन : 740 अरब डॉलर, स्विट्जरलैंड : 602 अरब डॉलर, सऊदी अरब : 553 अरब डॉलर, ताईवान : 434.0 अरब डॉलर, ब्राजील : 373 अरब डॉलर, दक्षिण कोरिया : 372 अरब डॉलर, रूस : 365 अरब डॉलर, भारत : 320 अरब डॉल