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दोबारा प्रधानमंत्री बनने की राह पर एचडी देवगौड़ा

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HD deve gowda

सूत्र कहते हैं कि जब वाम दलों की जिद से सीताराम येचुरी (Sitaram Yechuri) ने संयुक्त मोर्चा (United Front) सरकार से कांग्रेस (Congress) का समर्थन वापस ले लिया और एचडी देवगौड़ा (HD deve gowda) को प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटना पड़ा तो उसके बाद किसी ज्योतिषी ने उन्हें कहा था कि उनकी जन्म कुंडली में एक बार फिर प्रधामंत्री बनने का योग है। हालाकि 2013 में विधानसभा चुनावों (Karnatak assembly elections) और फिर 2014 में लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) में जद(एस) Janata Dal (secular) की विफलता से उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा लेकिन वर्तमान हालात ने उनकी आंखों की चमक फिर से लौटा दी है और ज्योतिषी की भविष्यवाणी सत्य होने के आसार बन गये हैं।
कहते है कि समय-समय पर इतिहास (political history) खुद को दोहराता है और देश तत्कालीन राजनीतिक स्थितियां कह रही हैं वर्ष 2019 में देश की जनता एक बार फिर उन जैसे हालातों से रू-ब-रू हो सकती है जैसी वह 1989 और 1996 में देख चुकी है। kanrataka में एचडी कुमारस्वामी (HD Kumaraswamy) के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा (HD Deve Gowda)परिदृश्य में आ चुके हैं और वह 2019 में कुछ वैसी ही भूमिका निभा सकते हैं जैसे 1989 में हरियाणा के दिग्गज देवीलाल और 1996 व 2004 में माकपा के बुजुर्ग और तत्कालीन पार्टी महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत (harkishan singh surjeet) ने निभाई थी। देवीलाल (Devilal) ने अपने राजनीतिक करियर (political career) में दूसरों के लिए कई दांव चले। कई नेताओं को सत्ता की चौखट पर पहुंचाया, उम्मीद है कि 2019 में अगर kanrataka की तरह त्रिशंकु संसद (hung parliament) सामने आई तो साउथ ब्लॉक की सीढ़ियां चढ़ने के सारे दांव देवगौड़ा अपने लिए चलेंगे। 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री रह चुके देवगौड़ा देवीलाल की गलतियां नहीं दोहरायेंगे।

आज की कल्पना, कल की हकीकत

HD deve gowda

kanrataka विधानसभा चुनाव के बाद शकील अहमद, राजीव त्यागी और अभय दुबे जैसे कांग्रेस (Congress) नेताओं के सामने पत्रकारों ने यह प्रश्न रखना शुरू कर दिया कि क्या त्रिशंकु लोकसभा (hung parliament) की स्थिति में क्या कांग्रेस (Congress) देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाना स्वीकार करेगी। हालांकि इन नेताओं ने इसे काल्पनिक प्रश्न कहकर टाल दिया। लेकिन राजनीति की मध्यम समझ रखने वाला कोई जानकार भी यह विश्लेषण आराम से कर सकता है कि भाजपा (BJP) को सत्ता से बाहर रखने के लिए कांग्रेस (Congress) इस तरह का कदम आराम से उठा सकती है। 1996 का इतिहास (political history) गवाह है कि किस प्रकार 161 सीट प्राप्त करने वाली भाजपा (BJP) को सत्ता पाने से रोकने के 140 सीट वाली कांग्रेस (Congress) ने गठबंधन का शातिर फार्मूला अपनाया और मात्र 46 सीट प्राप्त करने वाले जनता दल के नेता एचडी देवगौड़ा (HD Deve Gowda) की किस्मत जाग गयी। उसी गठबंधन की कांग्रेसी राजनीति के चलते kanrataka में देवगौड़ा परिवार की किस्मत फिर जागी और त्रिशंकु विधानसभा में सबसे कम सीटें प्राप्त करने वाली पार्टी के मुखिया और देवगौड़ा के सुपुत्र एचडी कुमारस्वामी (HD Kumaraswamy)राज्य के सिंहासन पर आसीन हो चुके हैं।

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साफ इशारा कर रहे हैं चुनावी गणित के आंकड़े

kanrataka में चुनावी गणित के आंकड़ों की बात करें तो कांग्रेस (Congress) और जनता दल (एस) को मिलाकर 58 फीसदी वोट शेयर हासिल हुआ है। इस वोट शेयर से लोकसभा में kanrataka की 28 लोकसभा सीटों का दावा किया जा सकता है। यह भाजपा (BJP) के मिले 37 प्रतिशत वोट शेयर (vote share) से खासा अधिक है। kanrataka में भले ही कांग्रेस (Congress) के हाथ से राज्य की सत्ता फिसल गयी हो लेकिन उसके एक बड़ा फायदा यह हुआ है कि उसने भारतीय राजनीति के वयोवृद्ध और सम्मानित देवगौड़ा (HD Deve Gowda) को अपने साथ मिला लिया है। यह गठबंधन 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस (Congress) के पक्ष में बड़ा खेल खड़ा कर सकता है। बुजुर्ग वोक्कलिंगा नेता देवगौड़ा की अभी उम्र 85 साल है वह भारतीय राजनीति में एक बड़ी पारी खेल चुके हैं। प्रधानमंत्री रह चुके हैं इस वजह से वरिष्ठता के क्रम में भी ऊपर हैं। ज्योतिषी भी उनके दोबारा प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी कर चुके हैं।

HD deve gowda के पक्ष में बन रहा माहौल

विपक्ष के सभी दिग्गज नेताओं शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी, मायावती, चंद्रशेखर राव, नवीन पटनायक, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव,एम करुणानिधि, सीताराम येचुरी आदि से HD Deve Gowda के बेहद अच्छे रिश्ते हैं। कांग्रेस (Congress) से गठबंधन होने से पहले भी उनके सोनिया गांधी, गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल आदि से भी मधुर रिश्ते रहे हैं। ये सारे नेता देवगौड़ा का सम्मान भी करते हैं। विपक्ष के युवा नेताओं अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, आदि भी HD Deve Gowda का आदर करते हैं। गठबंधन से पहले भले ही चुनाव में राहुल गांधी ने जद (एस) को भाजपा (BJP) की बी टीम कहा हो, लेकिन गठबंधन के बाद से राहुल भी बेहद आदर से देवगौड़ा को संबोधित करने लगे हैं।
इस लिहाज से देखा जाये तो देवगौड़ा के पास वह सबकुछ है जो त्रिशंकु संसद (hung parliament) होने की स्थिति में केंद्र के राजनीतिक समीकरण अपने पाले में करने की क्षमता रखता है लेकिन अभी उनकी मन:स्थिति स्पष्ट नहीं है। वे ऐसी स्थिति में बिसात खुद के लिए बिछायेंगे या अपनी ऊर्जा, तजुर्बे का प्रयोग राहुल गांधी, ममता बनर्जी, मायावती या किसी और को प्रधानमंत्री बनाने के लिए करेंगे।

अब तैयारी दिल्ली की राजनीति की

सूत्रों का कहना है कि kanrataka में कुमारस्वामी (hd kumaraswamy) सरकार के गठन के बाद वह खुद को दिल्ली की राजनीति करने की उपायों पर काम करेंगे। वह देवीलाल और सुरजीत की तर्ज पर भाजपा (BJP) विरोधी मोर्चे के गठन का रास्ता तैयार करेंगे।
उनकी चुनौती यह है कि जहां ममता बनर्जी, मायावती, चंद्रबाबू नायडू, चंद्रशेखर राव, नवीन पटनायक का जोर गैर भाजपा (BJP) और गैर कांग्रेस (Congress) रीजनल फ्रंट बनाने पर है, वहीं शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, सीताराम येचुरी आदि नेता कांग्रेस (Congress) के साथ मिलकर भाजपा (BJP) विरोधी मोर्चा बनाने के हक में हैं।हालांकि शरद पवार ने ममता बनर्जी को इस बात के लिए राजी कर लिया है कि बिना कांग्रेस (Congress) के भाजपा (BJP) विरोधी मोर्चे की बात निरर्थक है। ममता को कांग्रेस (Congress) को साथ लेने में कोई एतराज नहीं है लेकिन वह कांग्रेस (Congress) को नेतृत्वकारी भूमिका देने को राजी नहीं हैं।
दरअसल, साल 2019 कई ममता, मायावती जैसे कई नेताओं को संभावनाओं का साल लग रहा है। जिसने उनके मन में प्रधानमंत्री बनने की अभिलाषा जगा दी है। और यही वजह है कि ये क्षेत्रीय जानबूझकर राहुल (Rahul Gandhi) को नेता को रूप में स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इन सारे अंतर्विरोधों को साधना ही अब देवगौड़ा (HD Deve gowda) का प्रमुख उद्देश्य होगा। क्योंकि उनकी सफलता इसी में निहित होगी।
देवगौड़ा (Deve gowda) कांग्रेस (Congress) को भी साधे रखने की क्षमता रखते हैं और विपक्षी क्षत्रपों को भी। अगर लोकसभा चुनावों के बाद अगर कांग्रेस (Congress) सबसे बड़े दल क रूप में उभर कर नहीं आ सकी तो उनके नाम पर सर्वसहमति बनना कोई बड़ी बात नहीं रह जायेगी और वह एक बार फिर राष्ट्रपति भवन के दरबार सभागार में पद और गोपनीयता की शपथ ले सकेंगे।