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उपचुनाव नतीजे : ब्रांड मोदी पर भारी पड़ रहा महागठबंधन

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हिंदुत्व के अश्वमेधी रथ पर सवार BJP कैराना लोकसभा उपचुनाव में हार के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में कई मायने निकाले जा रहे हैं। इसके पहले पार्टी गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रत्याशी और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के संसदीय क्षेत्र फूलपुर से उपचुनाव में हार का दंश झेल चुकी है। जिस उत्तर प्रदेश में पार्टी प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में सत्ता में आयी थी अब वहीं पर हो रहे लोक और विधान सभा के उपचुनावों में हार रह ही।

ये रही उपचुनावों में सत्ताधारी पार्टी BJP की हालत

बीते वीरवार को देश के 11 राज्यों में कुल 4 लोकसभा और 10 राज्य विधान सभाओं के उपचुनाव के नतीजे आये। जिनमें BJP कुल 3 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। उसने उत्तर प्रदेश की कैराना और महाराष्ट्र की भंडारा-गोदिया लोकसभा सीट गंवा दी। हालांकि महाराष्ट्र की पालघर सीट जैसे तैसे जीतने में कामयाब हो सकी। वहां भी उद्धव ठाकरे भाजपा और चुनाव आयोग दोनों पर भ्रष्टाचार करने के आरोप लगाये हैं। उद्धव ने चुनाव आयोग के खिलाफ कोर्ट जाने की धमकी दी है।

अब BJP की संसद में ये है स्थिति

2014 में 282 सांसदों के साथ लोकसभा पहुंची भारतीय जनता पार्टी के पास अब 272 सांसद रह गये हैं। सांसद बीएस येदियुरप्पा और श्रीरामलु भी इस्तीफा दे सकते हैं। अभी 4 सीटें खाली हैं।

अजीत सिंह और RLD ने बचाया राजनीतिक अस्तित्व

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दरअसल यह चुनाव जाट नेता चौधरी अजीत सिंह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के राजनीतिक वजूद के लिए काफी अहम था और इसके लिए उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी। अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत सिंह ने अपने उम्मीदवार तबस्सुम हसन के लिए लोगों के घर-घर जाकर वोट मांगे। उन्होंने इस चुनाव को बिरादरी की अस्मिता से जोड़ दिया। योगी आदित्यनाथ ने इस कवायद को बाप-बेटे की घर-घर जाकर वोंटों की भीख मांगने की कवायद बतायी। क्योंकि यह बयान एक गैर जाट ने दिया था इस वजह से इसने जाटों को लामबंद होने का बड़ा मौका दिया। परिणाम यह रहा कि आरएलडी उम्मीदवार तबस्सुम हुसैन ने BJP प्रत्याशी मृगांका सिंह को 55,000 वोटों से पराजित किया।

नये फार्मूले पर चला महागठबंधन

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इस जीत ने बता दिया कि 2019 में महागठबंधन की राजनीति भाजपा के चाणक्य और महान रणनीतिकार अमित शाह और चुनावों के जादूगर व देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारी पड़ने वाली है। जिस तरह सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक मंच पर आकर इस तिलस्मी जोड़ी को गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में मात दी है इस तरह के गठबंधन पूरे देश में चुनावी गणित का आधार बन सकते हैं। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इस वर्ष भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन की राजनीति शिखर पर रहने वाली है और ब्रांड मोदी पर भारी पड़ सकती है।

दकियानूसी और परंपरागत ढर्रों से बाहर निकल स्मार्ट बन चुका है महागठबंधन

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इस राजनीति को अब हम 1977 की जनता पार्टी गठबंधन या 1997 का संयुक्त मोर्चे की तरह नहीं ले सकते हैं। जिसमें सभी दलों के नेता अपनी-अपनी महात्वाकांओं और अपने-अपने एजेंडों के साथ आते हैं और उनके पूरा न होने पर बिखर कर अलग हो जाते हैं। समय के साथ सीखते हुए गठबंधन की राजनीति में बदलाव आया है। अब वह वन-टू-वन के फार्मूले के साथ सामने आया है। इसकी प्रणेता ममता बनर्जी हैं।
इस रणनीति के तहत जहां जो प्रत्याशी मजबूत है उसे मौका दो और उसके विपक्ष में प्रत्याशी को मत उतारो। जैसे गोरखपुर, फूलपुर में बसपा ने सपा के खिलाफ प्रत्याशी नहीं खड़ा किया। कैराना लोकसभा सीट में RLD और नूरपुर विधानसभा में सपा को विपक्षी दलों ने मौका दिया।

उपचुनावों में हार का BJP पर विशेष फर्क नहीं

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भले ही उपचुनाव के नतीजे भारतीय जनता पार्टी के हित में न गये हों लेकिन इसका अभी काफी बड़ा अनुमान लगा लेना जल्दबाजी होगा। पहली बात तो यह है कि ये उपचुनाव हैं इनके लिए ब्रांड मोदी ने जरा भी जोर नहीं लगाया। यूपी-बिहार जैसे राज्यों में बढ़ती चुनौतियों से निपटना मोदी के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं है। जिस तरह वेस्ट बंगाल में BJP मजबूत हो रही है। पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे असम, त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में जिस तरह पार्टी ने मजबूत प्रदर्शन किया है। तमिलनाडु, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी BJP अपनी पैठ लगातार मजबूत कर रही है।

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बीजेपी के लिए मुश्किलें

रोजगार के मुद्दे पर विफलता
किसान असंतुष्ट
राम मंदिर के मुद्दे पर कोई ठोस परिणाम सामने न आना
आर्थिक घोटाले
जेडीयू, शिवसेना, यूपी में ओपी राजभर की पार्टी असंतुष्ट
टीडीपी ने एनडीए से नाता पहेल ही तोड़ा
असम में असम गण परिषद भी अब दोस्त नहीं
कांग्रेस और महागठबंधन खेमे में लगातार बढ़ रही दलों की तादाद

जल्द हो सकते हैं लोक सभा के चुनाव

इस वर्ष राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित 7 राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके बाद अगले साल की शुरुआत में ही आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में चुनाव होने हैं। अगर BJP राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विजयी प्रदर्शन करती है तो काफी ज्यादा उम्मीद है कि लोक सभा समय के पहले स्थगित कर दी जायेगी और अगले वर्ष होने वाले लोक सभा चुनाव और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के विधान सभा चुनाव साथ ही आयोजित होंगे।
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