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गठबंधन की गांठ में उलझ गयी सत्ता की चाबी

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कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी सरकार के गठन के बाद केंद्र की राजनीति में नये समीकरणों Political Alliance पर चर्चा शुरू हो चुकी है। कारण है कि अगले साल यानि 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और देश के राजनीतिक हालात कह रहे हैं कि ये चुनाव न तो सत्ताधारी पार्टी, ना कांग्रेस और ना ही क्षेत्रीय पार्टियों के लिए आसान होने जा रहे हैं। भले ही बीते 4 सालों में चुनाव दर चुनाव देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस केंद्र के बाद राज्य दर राज्य अपनी जमीन खोती चली गयी हो लेकिन आने वाले समय में सत्ताधारी दल भाजपा के लिए भी चुनौतियां खड़ी हो सकती है। अगले चुनावी वर्ष में कांग्रेस और क्षेत्रीय देश के राजनीतिक परिदृश्य में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि क्षेत्रीय दलों को एकजुट करना और विपक्ष को एक छतरी तले ले आना कांग्रेस के लिए एक बड़ी परीक्षा है।

कर्नाटक के जमावड़े से नहीं है बहुत उम्मीद

कुमारस्वामी की ताजपोशी के अवसर पर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का जो जमावड़ा देखने को मिला उससे ऊपर तौर पर तो यह दिखायी दे रहा है कि इस एक वर्ष में विपक्ष संगठित होकर उभरेगा और लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने कड़ी चुनौती खड़ा करेगा लेकिन इस तथ्यों का विश्लेषण करने पर दूसरी ही तस्वीर सामने आती है।
पहली बात तो यह है कि भाजपा के दबाव में विपक्ष Political Alliance संगठित हो भी गया तो चुनाव पूर्व और चुनाव बाद उसका नेतृत्व कौन करेगा। वर्तमान में तो ऐसी स्थिति कतई नहीं दिखती।

विधान सभा चुनाव में प्रदर्शन निर्धारित करेगी स्थिति

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दरअसल, कांग्रेस के दबदबे की काफी कुछ सफलता इस वर्ष होने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव के प्रदर्शन पर निर्भर करेगी। अगर कांग्रेस इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करती है तो ही क्षेत्रीय दल कांग्रेस का दबदबा स्वीकार करेंगे अन्यथा कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों का दबदबा स्वीकार करना होगा। यह स्थिति 1997 के लोक सभा चुनावों के बाद की जैसी हो सकती है। जब 46 सीटें जीतने वाली जनता दल (सेक्युलर) के मुखिया एचडी देवगौड़ा को कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद पर बैठाया था।

चुनावी रणनीतिकार मानते हैं कि 2019 का चुनाव कांग्रेस सत्ता के लिए न लड़कर सिर्फ दबदबे लिए लड़ेगी। क्योंकि ज्यादातर स्थितियां उसके प्रतिकूल ही हैं। उसका पहला उद्देश्य किसी तरह विपक्ष Political Alliance को संगठित कर मोदी-शाह के चक्रव्यूह को तोड़ना होगा।

दो धड़ों में संगठित हो रहा है विपक्ष Political Alliance

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तथ्य यह है कि विपक्ष संगठित तो हो रहा है लेकिन एक नहीं दो धड़ों में। पहला धड़ा है जो कांग्रेस के नेतृत्व में खुद को संगठित करने का प्रयास कर रहा है। इनमें शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, सीताराम येचुरी जैसे नेता शामिल हैं और दूसरा है ममता बनर्जी, मायावती, चंद्रबाबू नायडू, चंद्रशेखर राव, नवीन पटनायक का। जो गैर-भाजपाई और गैर-कांग्रेसी रीजनल फ्रंट बनाने पर जोर दे रहा है। दरअसल ये नेता 2019 को संभावनाओं का साल देख रहे हैं। उनकी महात्वाकांक्षायें हिलोरें मार रही है। सीधी बात कहूं ये नेता स्थितियां और समीकरणों पर प्रधानमंत्री बनने की अभिलाषा पाल रहे हैं। और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है।

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दोबारा प्रधानमंत्री बनने की राह पर एचडी देवगौड़ा

 

उत्तर प्रदेश सबसे बड़ी पहेली

कांग्रेस के सामने सबसे जटिल समस्या है तो 80 लोक सभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश। जहां से 71 सीटें जीतकर ही केंद्र की वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा ने अपनी राह बनायी है। यहां कांग्रेस के सामने भाजपा ही समस्या नहीं है, बल्कि अखिलेश और मायावती का गठबंधन भी किसी चुनौती से कम नहीं है। अगर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों कांग्रेस के साथ तालमेल बना भी लें तो सीटों के बंटवारे में बहुत बड़ी समस्या आने वाली है। पूरे प्रदेश में ये दोनों पार्टियां अगर 10 सीटें ही छोड़ने पर राजी हो जायें तो बड़ी बात नहीं होगी। इस वर्ष गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में भी कांग्रेस ने लचर प्रदर्शन किया है। यह चीज कांग्रेस के विरोध में जा सकती है।

ये राज्य हैं सबसे जटिल

कांग्रेस के सामने गठबंधन Political Alliance को लेकर सबसे जटिल राज्य हैं उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, उड़ीसा, असम, त्रिपुरा और नगालैंड। नगालैंड और त्रिपुरा में कांग्रेस का जनाधार ही सिमट गया है। त्रिपुरा में कांग्रेस को माकपा और तृणमूल कांग्रेस में से किसी एक के साथ ही गठबंधन हो सकता है। यही हालत पश्चिम बंगाल में है, जबकि केरल में माकपा के साथ ही कांग्रेस का मुकाबला है।

इन राज्यों में होगी सहुलियत

-महाराष्ट्र में कांग्रेस को शरद पवार की एनसीपी के साथ गठबंधन और तालमेल में कोई विशेष समस्या नहीं आयेगी
-जम्मू कश्मीर
कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस
तमिलनाडु
डीएमके-कांग्रेस
झारखंड
हेमंत सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चे -कांग्रेस
मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, गोवा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल, सिक्किम जैसे राज्यों में गठबंधन की जरूरत नहीं।

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