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क्यों मची है दुनिया में खलबली

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दुनिया की दो सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं चीन और अमरीका के बीच ट्रेड वार trade war छिड़ने के बाद शेयर बाजारों में खलबली मची है। चीन के शेयर बाजार में तो ऐसी दहशत मची कि शंघाई कंपोजिट इंडेक्स में 19 प्रतिशत की गिरावट आ गई। शुक्रवार को यह इंडेक्स 2,889.76 के अंक पर बंद हुआ। इस सप्ताह चीन के शेयर बाजार को 514 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है, यह आंकड़ा स्वीडन की अर्थव्यवस्था के बराबर है।

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन उत्पादों पर 200 अरब डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाने की चेतावनी के बाद निवेशकों में डर का माहौल बन गया है। शेयर बाजार में बिकवाली हावी हो गयी है। अगले कारोबारी सत्र में अमेरिकी बाजारों में भी कुछ ऐसा ही माहौल बन सकता है। अगर ऐसा हुआ तो दुनिया भर के शेयर बाजार प्रभावित हो सकते हैं।
अमेरिका ने पिछले सप्ताह चीन के 50 अरब डॉलर की वस्तुओं पर शुल्क लगा दिया था। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका के 50 अरब डॉलर के 659 उत्पादों पर शुल्क लगा दिया था। साथ ही ट्रंप ने चीन को 200 अरब डॉलर के अतिरिक्त चीनी सामानों पर शुल्क लगाने की चेतावनी दी थी।

क्यों हो रहा है ट्रेड वार trade war

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इस प्रकार की नीतियां तब अपनायी जाती हैं जब देश में बने उत्पादों को प्रोत्साहित करना होता है और विदेशी सामान को हतोत्साहित। विदेशी सामान पर कर बढ़ाने का मतलब ये होता है कि वह सामान महंगे हो जाएंगे और लोग उन्हें खरीदना कम कर देंगे। ताकि घरेलू अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाया जा सके। इससे trade war को हवा मिलती है।

trade war शीत युद्ध से भी खतरनाक हो सकता है

दरअसल वैश्विक गांव की संकल्पना के साथ पूरी दुनिया लगभग 50 वर्षों से जिस दिशा में दौड़ रही थी, न सिर्फ उसमें ब्रेक लग गया है, बल्कि उसकी बग्घी के घोड़े उल्टी दिशा में दौड़ पड़े हैं। वैश्वीकरण का बढ़ता विरोध, पुराने किस्म के राष्ट्रवाद की वापसी, अप्रवासियों के खिलाफ तीव्र भावनाएं और लोकप्रिय धारणाओं के मुताबिक राष्ट्रीय नीतियां बनाने का संकल्प, ये सारे तथ्य ट्रेड वार का कारण हैं। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों की सरकारों पर अपने नागरिकों के रोजगार के संरक्षण, उनके हितों का संरक्षण का दबाव इस कदर बढ़ रहा है कि ट्रेड वार trade war जैसी स्थितियां निकलकर आ रही हैं।

भारत-चीन के बीच खुल सकते हैं नये अवसर

चीन की अर्थव्यवस्था का आकार 11.5 ट्रिलियन डॉलर का है, जबकि भारत का चीन के मुकाबले 5 गुना छोटा है। भारत की अर्थव्यवस्था 2.3 ट्रिलियन डॉलर की है। लेकिन ट्रेड वार trade war की स्थिति भारत और चीन के बीच नये अवसर खोल सकती है। चीन से भारत सालाना 53 बिलियन डॉलर का आयात करता हैं जबकि चीन महज 16 बिलियन डॉलर का ही भारत से आयात करता है। चीन भारत से मुख्य रूप से कृषि उत्पाद और रॉ मटीरियल आयात करता है। दुनिया में जारी यह ट्रेड वार भारत और अमेरिका को नजदीक ला सकता है।

भारत-चीन के बीच व्यापारिक संबंध

चीन अगर इलेक्ट्रॉनिक बाजार के लिए भारत पर निर्भर है तो भारत दवा के रॉ मैटेरियल और सस्ती तकनीक के लिए चीन पर। भारत का सोलर मार्केट चीन पर आधारित है। इसका 2 बिलियन डॉलर का व्यापार है। भारत का थर्मल पावर भी चीनियों पर ही निर्भर हैं। पावर सेक्टर के 70 से 80 फीसदी उत्पाद चीन से आते हैं। दवा उद्योग के रॉ मैटेरियल का आयात करने में भी भारत पूरी तरह से चीन पर निर्भर है। पिछले 4 दशक में पश्चिमी तकनीक को चीन ने कॉपी किया और सस्ते में बेचा है। भारत में चीनी मोबाइल का मार्केट भी बहुत बड़ा है। मोबाइल मार्केट में चीन का 55 से 56 फीसदी का कब्जा है। अब सैमसंग पीछे छूट गई है। चीन दिल्ली मेट्रो में भी जुड़ा हुआ है।

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संबंधों को और मजबूत कर लें तो बेहतर

दोनों देशों के बीच हाल में हुए समझौते के बाद चीन अपने बाजारों को भारत के सोयाबीन, चीनी, चावल और सफेद सरसों के लिए खोलेगा। ऐसे समय में जब अमेरिका संरक्षणवादी नीतियां अपनाते हुए ट्रेड वार तरफ बढ़ रहा है तो भारत और चीन अपने व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत कर लें तो बेहतर है।