Home nation आखिर चपरासी क्यों बनना चाहते हैं पीएचडी और पोस्ट ग्रेजुएट

आखिर चपरासी क्यों बनना चाहते हैं पीएचडी और पोस्ट ग्रेजुएट

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देश में रोजगार की स्थिति इतनी विकट है कि अगर चपरासी की वैकेंसी भी सामने आती हैं तो हजारों की संख्या में पीएचडी धारक, इंजीनियर, पोस्ट ग्रेजुएट बड़ी संख्या में आवेदन करते हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश में चपरासी की नौकरी 50 हजार ग्रेजुएट, 28 हजार पोस्ट ग्रेजुएट और 3700 पीएचडी धारकों ने आवेदन किया। कुल 93 हजार आवेदन आये जिसमें सिर्फ 7400 उम्मीदवार ही ऐसे थे, जो इस पद के लिए न्यूनतम योग्यता रखते थ यानी 5वीं या 8वीं पास थे। इसमें एमबीए पास युवाओं ने भी आवेदन किया। contract jobs

contract jobs : पूरे देश की है ये स्थिति

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ये वास्तविकता सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है। उत्तर भारत के तमाम राज्यों बिहार, झारखंड, उड़ीसा यहां तक की मध्य प्रदेश, राजस्थान में बेरोजगारी की स्थिति विकट बनी हुई है। इससे भी बड़ी बात है कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अभी हाल ही में व्यक्तव्य दिया कि नौकरियों की कमी नहीं है बल्कि योग्य उम्मीदवार नहीं हैं। अब समझ में नहीं आ रहा है कि चपरासी की नौकरी के लिए पीएचडी, एमबीए और पोस्ट ग्रेजुएट से और क्या ज्यादा योग्यता चाहिए। ये आलम तब है जब सत्ताधारी केंद्र सरकार नौकरियों का मुद्दा उठाकर ही सत्ता में आयी और युवाओं को लिए विकास योजनाओं की बड़ी-बड़ी बातें की गयी। contract jobs

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contract jobs : बरोजगारी नहीं है सबसे बड़ी समस्या

दरअसल, हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है ही नहीं। ये उच्च शिक्षा प्राप्त लोग जो इन छोटे सरकारी पदों पर काम करने के लिए तत्पर हैं, इनमें से सभी घर पर बैठकर सरकारी नौकरी का इंतजार नहीं कर रहे होंगे। ये लोग किसी न किसी संगठन से जुड़कर अपनी रोजी-रोटी कमा लेते हैं। अब जैसे पीएचडी धारक या पोस्ट ग्रेजुएट है तो वो किसी यूनिवर्सिटी या निजी कालेज में लेक्चरर लगा होगा। किसी पुस्तक प्रकाशन में लेखन या प्रूफ रीडिंग का काम रहा होगा या अन्य किसी काम में। लेकिन जब कोई सरकारी नौकरी का आवेदन सामने आता है तो चाहे वह चपरासी की ही क्यों न हो और चाहे उसका वेतन 20,000 रुपये ही क्यों न हो उसपर झपट पड़ता है। यह जानते हुए भी यह काम उसके शैक्षणिक और मानसिक दर्जे का नहीं है। contract jobs

न रोजगार न पगार, मजे ले रहा शेयर बाजार

contract jobs : छोटे पदों के लिए क्यों आवेदन करता पढ़ा-लिखा युवा

जब सैलरी भी कम है, काम भी दर्जे का नहीं है तो फिर यह पढ़ा-लिखा युवा इन छोटे पदों के लिए आवेदन क्यों करता है। इसका सबसे बड़ा कारण है संस्थाओं में शोषण और आर्थिक असुरक्षा। contract jobs

contract jobs : ठेका तंत्र के हवाले हो रहा युवाओं का भविष्य

एक ही संस्था में एक ही काम के लिए वेतनमान अलग-अलग होते हैं। जैसे यूनिवर्सिटी का नियमित लेक्चर लाखों में वेतन लेता और ठेके पर रखे गये शिक्षक से अपना गुजारा 10 या 12 हजार से ही चलाने की अपेक्षा। दूसरा ठेका कर्मी को नौकरी पर रख लेना और निकाल बाहर कर देना संस्थाओं के लिए आसान है। contract jobs

contract jobs : मरता क्या न करता

बेरोजगारी की वजह से ये युवा संस्थान की शर्तों पर काम करने के लिए राजी होते हैं और संस्थान अपनी मर्जी से बिना किसी कानूनी या आर्थिक अड़चन के इन्हें मौका पड़ने पर बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। जबकि नियमित कर्मियों के साथ वे ऐसा नहीं कर पाते। contract jobs

contract jobs : क्या कभी पीएम ने की है स्थिति को समझने की कोशिश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस स्टार्टअप इंडिया-स्टार्टअप इंडिया का कोलाहल इतने समय से मचा रहे हैं शायद ही उन्होंने कभी ये जानने की कोशिश की हो कि इनमें युवाओं को कितना वेतन मिल रहा है। यही हाल अन्य निजी कंपनियों का है। गिने-चुने इंजीनियरिंग कालेज को छोड़कर ज्यादातर युवाओं को 10-15 हजार की नौकरी ही मयस्सर नहीं हो पा रहे। इससे तो बेहतर है नियमित 20,000 हजार रुपये की सरकारी नौकरी ही मिल जाये अब वो चाहे चपरासी की क्यों न हो। contract jobs

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contract jobs : काम करोगे तो काम अपने आप आ जायेगा

यह बात एकदम गलत है कि हमारी शिक्षा प्रणाली रोजगारोन्मुख नहीं है। रोजगार की बारीकियां तो काम करके ही सीखी जा सकती हैं। यूनिवर्सिटी और कालेज तो अच्छी किताबी और सैद्धांतिक शिक्षा दे दें तो वही कम है क्या। होना तो यह चाहिए स्कूलों, कालेजों और यूनिवर्सिटी को बेहतर किताबी और व्यवहारिक शिक्षा के योग्य बनाया जाये और युवाओं का शोषण करने वाले प्रतिष्ठानों पर सरकारों का हस्तक्षेप हो।

बेरोजगारी भत्ता न सही, कम से कम शोषण तो न कराओ

सरकार बेरोजगारी भत्ता नहीं दो सकती तो क्या यह भी नहीं कर सकती हैं कि एक निश्चित योग्यता के लिए न्यूनतम वेतन सीमा निर्धारित कर दे। एक निश्चित डिग्री धारक के लिए न्यूनतम वेतन देना कंपनियों के लिए अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। एक ही काम के लिए ठेका प्रणाली के लिए वेतन विभेद को तुरंत रोका जाना चाहिए। अगर युवाओं को निजी प्रतिष्ठानों में बेहतर वेतन और आर्थिक सुरक्षा दे दी जाये तो निश्चित तौर पर उनमें सरकारी नौकरी के लिए आकर्षण कम होगा और चपरासी के पद के लिए वही आवेदन करेंगे तो उसके लिए आवश्यक न्यूनतम योग्यता रखते हैं। contract jobs

contract jobs : श्रम नीति पर एक बार पुनर्विचार करे सरकार :

आज बेरोजगारी की जो समस्या सामने आ रही है दरअसल वह सरकार की श्रम नीतियों की देन है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में देश का आम नागरिक मांग एवं आपूर्ति पर छोड़ दिया गया है। निजी संस्थानों को तो छोड़ो सरकारें अपने विभागों में ठेका और आउटसोर्स प्रणाली को बढ़ावा दे रही है। खर्चों को कम से कम करने का सबसे बड़ा जरिया है कम से कम वेतन पर अधिक से अधिक योग्य आदमी को काम पर रखना और न तो उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा देने का बंधन। contract jobs

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contract jobs : बस एक मौका मिल जाये

नतीजा यह हुआ है कि लोग मजबूरी में ठेका, आउटसोर्स और कम वेतन पर काम करने को राजी तो जाते हैं लेकिन किसी स्थायी सरकारी नौकरी के तलाश में रहते हैं और जब चपरासी जैसे पद पर सरकारी नौकरियों की वैकेंसी सामने आती हैं तो पीएचडी, एमबीए, इंजीनियर, पोस्ट ग्रेजुएट उम्मीदवार आवेदन करने पहुंच जाते हैं। contract jobs

contract jobs : मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर छोड़ दिया गया है आम आदमी

ठेका, आउटसोर्स की नीति और देश के आम कामगार को मांग एवं आपूर्ति पर छोड़ देने की नीति उस समय तो खूब कारगर होती है जब देश में निजी निवेश जोरों पर होता है। उत्पादन में बढ़ोतरी हो रही होती है। नये श्रमिकों की मांग होती है। लेकिन जब बाजार में मांग का अभाव होता है, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय कारणों से पेट्रोल-डीजल के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हों, महंगाई बढ़ रही हो, डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा हो, नया निवेश न आ रहा हो तो ये नीति युवाओं को तबाही की ओर ले जाती है। contract jobs

contract jobs : एक बार संविधान उठाकर तो देख लो

हमारे संविधान निर्माता और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े तत्कालीन नेता इस समस्या से अच्छी तरह वाकिफ थे। इसी वजह से उन्होंने देश में समाजवाद और पूंजीवाद के सम्मिलन वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था की व्यवस्था दी। contract jobs

contract jobs : गांधी जी ने पहले ही बता दिया था समाधान

गांधी जी अपने पूरे जीवन भर कहते रहे कि देश की आत्मा उसके गांवों में है। उन्होंने गांवों में कुटीर और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने का संदेश दिया। नेहरू ने बड़े उद्योगों की स्थापना तो की लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से अमेरिका, यूरोप और रूस के हवाले करने वाली नीतियों से बचते रहे। इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और सरकारी उद्योगों की बढ़ावा देने वाली नीतियों को अपनाया। contract jobs

contract jobs : आज काम नहीं करेंगी कल की नीतियां

लेकिन 1990 के दशक से स्थतियां बदलने लगीं। बाजारवाद और तकनीक ने गांवों में रहे सहे उद्योग समाप्त कर दिये। बड़ी-बड़ी कंपनियों के दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में केंद्रित हो जाने से कानपुर और कोलकाता जैसे शहर अपनी चमक खो बैठे। इन शहरों के उद्योग कभी देश की बड़ी आबादी को रोजगार देते थे। दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में रोजगार संकेंद्रित हो जाने से इन शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ा और यहां जनसंख्या का घनत्व बढ़ता चला गया।contract jobs

मनमोहन सरकार का दौर कुछ और था, अब हालात बदल गये हैं

1992 की मनमोहन सिंह सरकार के आर्थिक उदारीकरण से देश को फायदा हुआ क्योंकि मांग में तेजी बढ़ी। अमेरिका, यूरोप, की कंपनियों ने देश में निवेश किया। परिणाम रोजगार के साधन भी बढ़े। देश में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कालेजों कुकरमुत्ते की तरह उगने लगे। ये दौर वर्ष 2000 के दशक तक चालू रहा। 1998 में तत्कालीन अटल बिहारी सरकार में भी निजी उद्योग खूब फले-फूले। इससे उत्साहित होकर अटल बिहारी सरकार ने देश की सरकारी कंपनियों का जमकर निजीकरण किया। निजी क्षेत्र में बूम था लेकिन सरकारी नौकरियों की संख्या में जोरदार कमी कर दी। यूपीएससी आईएएस की जो वैकेंसी हजारों में निकलती थी वे 100-150 तक में सीमित रह गयीं। उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में युवाओं से अपील करनी शुरू कर दी कि वे उन्हें नौकरी नहीं दे पायेंगे, बल्कि लोन लेकर स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ें।

contract jobs : 2008 के बाद से बदल गये हैं हालात

लेकिन 2008 के बाद स्थितियां बदल गयीं। अमेरिका की लेमैन ब्रदर्स बैंक के आर्थिक संकट ने पूरी दुनिया को मंदी की चपेट में ले लिया, लाखों लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। उसके बाद अर्थव्यवस्था तो मजबूत हुई लेकिन वो चमक नहीं लौटी। आज कुछ बड़ी कंपनियों के लाभ की वजह से देश का शेयर बाजार तो चढ़ता जा रहा है लेकिन बाजार में बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है ।  contract jobs

contract jobs : सरकार की मनमानी ने तोड़ी युवाओं की रीढ़

ज्यादातर छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों की हालत खस्ता है। ये उद्योग ही युवाओं को बड़ी संख्या में नौकरी देते हैं। लेकिन जब ये उद्योग ही नहीं बचेंगे तो नौकरियां कहां से आयेंगी। नोटबंदी और जीएसटी के मनमाने कार्यान्वयन ने छोटे उद्योगों की कमर तोड़ दी है। नतीजा बेरोजगारी के रूप में हमारे सामने है। contract jobs

अब भी मौका है देश के गांवों की ताकत को समझा जाये। मिश्रित अर्थव्यवस्था की ओर लौटा जाये। देश के आम कामगार को मांग और आपूर्ति के दुष्चर्क से निकालने की नीतियां बनें तो राह उज्जवल हो सकती है।

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