Home Business भगवान सूर्य से सुख, शांति, समृद्धि मांगने का पर्व है ‘छठ’

भगवान सूर्य से सुख, शांति, समृद्धि मांगने का पर्व है ‘छठ’

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chhath pooja in india

 

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाये जाने वाले इस ‘छठ’ का आयोजन पूरे देश में व्यापक पैमाने पर किया जाता है| ज्यादातर उत्तर भारत के लोग इस पर्व को मनाते है| भगवान सूर्य को समर्पित इस पूजा में सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है| कई लोग इस पर्व को हठयोग भी कहते है| क्योंकि 4 दिनों तक मनाये जाने वाले इस पर्व के दौरान शरीर और मन को पूरी तरह से साधना पड़ता है और शुद्धता का विशेष रखना पड़ता है।

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chhath pooja in india
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इस वर्ष छठ महापर्व का आरम्भ 13 नवंबर यानि मंगलवार से हो रहा है| विशेष तौर पर बिहार, झारखंड, पूर्वी यूपी और नेपाल में आयोजित होने वाला छठ त्योहार पूरी तरह से भगवान सूय को समर्पित है।
ऐसा माना जाता है कि भगवान सूर्य की पूजा विभिन्न प्रकार की बीमारियों को दूर करने की क्षमता रखता है और परिवार के सदस्यों को लम्बी आयु प्रदान करती है|

 

कैसे हुई पर्व की शुरुआत :

chhath pooja in india
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पहली कथा सूर्यवंशी भगवान श्रीराम ने लंका और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद छठ पूजा की थी। उन्होंने माता सीता के साथ षष्ठी का व्रत किया था, सरयू नदी में डूबते सूर्य को अर्ध्य दिया, सप्तमी तिथि को उगते सूर्य को अर्ध्य दिया। इसी के साथ आम जनमानस के बीच इस त्योहार का प्रचलन शुरू हुआ। तब से लेकर आज तक करोड़ों लोग श्रद्धा और विश्वास के साथ छठ पूजा मनाते हैं।

दूसरी कथा कुछ विद्वानों का कहना है कि छठ पूजा की शुरुआत महाभारत के पात्र कर्ण ने की थी। दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा बना दिया। इस क्षेत्र को भागलपुर के नाम से भी जानते हैं। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। कुन्ती पुत्र कर्ण भगवान सूर्य के बेटे थे। वह जल में कमर तक खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य देते हैं। बाद में उनकी प्रजा ने भी अपने राजा का अनुसरण शुरू कर दिया। कालांतर में इस पूजा का दायरा बढ़ता चला गया।
तीसरी कथा पुराण में इस बारे में एक और कथा प्रचलित है। एक अन्य कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियवद की पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि ‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो’। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।

पूरे देश में मनाया जाता है पर्व 

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा की शुरुआत होती है। भारत के उत्तर और पूर्व के राज्यों में यह त्योहार बहुत धूमधाम मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के निवासी इसका विशेष आयोजन करते हैं। क्योंकि यहां के निवासी पूरे देश में फैले हुए हैं, इस वजह से कह सकते हैं कि पूरे देश में यह पर्व मनाया जाता है। देश की विभिन्न नदियों, सरोवरों के तट पर छठ पूजा के विशेष स्थानीय प्रशासन की ओर से किये जाते हैं।

ऐसे करते हैं त्योहार की विधियां  

chhath pooja in india
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पहला दिन: छठ पूजा के पहले दिन को ‘नहाय खाय’ के नाम से जानते हैं। इस दिन नहाने और खाने की विधि की जाती है और आसपास के माहौल को साफ सुथरा किया जाता है| इस दिन लोग अपने घरों और बर्तनों को साफ करते है और शुद्ध-शाकाहारी भोजन कर पर्व का आरम्भ करते है|
दूसरा दिन: दूसरे दिन को ‘खरना की विधि’ की जाती है| पूरे दिन का उपवास किया जाता है| निरजला उपवास किया जाता है| शाम होने पर साफ सुथरे बर्तनों और मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ के चावल, गुड़ की खीर और पुड़ियां बनायी जाती हैं। इन्हें प्रसाद स्वरूप बांटा जाता है|
तीसरा दिन: इस दिन शाम को भगवान सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है| सूर्य षष्ठी के नाम से प्रसिद्ध इस दिन को छठ पूजा के तीसरे दिन के रूप में मनाया जाता है| इस पावन दिन को पूरे दिन निराजल उपवास रखा जाता है और शाम में डूबते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है|
चौथा दिन: छठ पूजा के चौथे दिन सुबह सूर्योदय के वक़्त भगवान सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है| सूर्योदय के पहले ही लोग घाट पर पहुंच जाते हैं और उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देते हैं। छठी माता से घर-परिवार की सुख-शांति और संतान की रक्षा का वरदान मांगते हैं। इस पावन पूजन के बाद सभी में प्रसाद बांट कर व्रती खुद भी प्रसाद खाकर व्रत खोलते है|