Home Business सरकार की इच्छाशक्ति में छिपा है किसानों की खुशहाली का राज

सरकार की इच्छाशक्ति में छिपा है किसानों की खुशहाली का राज

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abul kalam
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शिवहर क्षेत्र के समाजसेवी अबुल कलाम खां देश में किसानों की समस्याओं का समाधान उनके कौशल विकास और नियमित आय में देखते हैं। उनका कहना है कि अगर देश के किसानों को कृषि के नये तरीकों, कैश एवं औषधीय खेती के उत्पादन के उपायों के बारे में बताया जाय तो उसकी सभी आर्थिक समस्याओं का निवारण किया जा सकता है।
कलाम का कहना है कि समय-समय पर किसानों की नियमित वेतन या स्टाइपेंड देने की मांग उठती है लेकिन किसानों की समस्याओं के निवारण करने का यह तरीका अव्यवाहरिक है। उनका मानना है कि किसानों को खेती के वैज्ञानिक तरीके बताये जायें। इसमें सरकार उसी प्रकार के तंत्र को विकसित करे जैसे पोलियो और आंगनवाड़ी के तंत्र को विकसित किया गया है। इन दोनों में प्रणालियों में वर्कर्स घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो के ड्राप्स और स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध कराते हैं उसी तर्ज पर विशेषज्ञ किसानों के घर जाकर उन्हें कम लागत, अधिक उत्पादन और अधिक गुणवत्ता वाली फसलों को उगाने की जानकारी दें। यह काम राष्ट्रीय स्तर पर किये जाने की जरूरत है।

गोपालगंज के राजीव का दिया उदाहरण

वह इसको लेकर बिहार के गोपालगंज में राजीव नामक किसान का उदाहरण देते हैं। राजीव पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं लेकिन अब वह खेती करते हैं और वह आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से। इन्होंने क्षेत्र के कई युवाओं को खेती का यह आधुनिक नजरिया विकसित करने में मदद की है। उनका कार्यक्षेत्र रांची का कुच्चू गांव है।
जहां पर वह खेती करते हैं वहां सिंचाई के लिए पानी अधिक मात्रा में मौजूद नहीं है। इसके लिए उन्होंने ड्रिप सिंचाई की व्यवस्था की है। और अब वह खरबूजे, तरबूत, खीरा, स्वीट कार्न, टमाटर और चेरी आदि उगाते हैं लेकिन परंपरागत तरीके से नहीं बल्कि वैज्ञानिक तरीके से।

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तरबूज से उगाते हैं लाखों

वह तरबूज उगान से पहले मटर उगाते हैं, इस वजह से नहीं कि उन्हें मटर का कारोबार करना करना है, बल्कि इसलिए ताकि मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा स्थिर हो जाये और तरबूज का उत्पादन ज्यादा हो।
कीटनाशक के रूप में नीम और करंजा की पत्तियों का इस्तेमाल करते हैं। फसलों के बीच में एक नपा-तुला फासला रखता हैं और मिट्टी की गुणवत्ता को समय-समय पर प्रयोगशाला में परीक्षण कराते हैं और साल में लाखों रुपये शुद्ध मुनाफे के रूप में कमाते हैं। उन्होंने अपने इस खेती के आधुनिक रूप न सिर्फ खुद के लिए करोड़ों का सम्राज्य खड़ा कर लिया है, बल्कि तमाम युवाओं को सफल कारोबारी बना दिया है।

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बन गये हैं युवाओं के प्रेरणास्रोत 

वह इसी प्रकार के अन्य उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि जब राजीव इस प्रकार से अन्य युवाओं को आधुनिक खेती का प्रशिक्षण दे सकते हैं तो सरकारें क्यों नहीं कर सकतीं?
इसके लिए उनका कहना है कि केंद्र/राज्य सरकार को जिले स्तर पर इस प्रकार के प्रशिक्षण केंद्र खोलने की जरूरत है, और उनके विशेषज्ञ अगर किसानों के पास जाकर किसानों को खेती के आधुनिक तौर तरीकों के बारे में प्रशिक्षण दें तो न सिर्फ किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि सरकारों का भी आर्थिक बोझ कम होगा। क्यों कि सरकारों पर उनके लोन माफी के रूप में अरबों रुपये का बोझ आता है जिससे देश का विकास प्रभावित होता है।

किसान को पूरे साल व्यस्त रहना जरूरी

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इसके लिए जरूरी है किसानों को खेती के तमाम पहुलुओं के बारे में बताकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाये और किसानों को सालभर तक व्यस्त रखा जाये।
उन्होंने कहा कि परंपरागत खेती के तहत आने वाले गेहूं, चावल, धान, सरसों आदि के अलावा किसानों को एलोवरा, केला, पपीता, शहद, मधुमक्खी पालन आदि की खेती के बारे में जानकारी दी जाये। उन्हें उनकी टार्गेट मार्केट के बारे में बताया जाय जहां वे अपनी फसलों को बेच सकें। मिट्टी की गुणवत्ता की जांच और कम पानी से सिंचाई करने के उपायों के बारे में बताया जाय तो किसानों की पैदावार बढ़ जायेगी और उनपर आर्थिक बोझ कम हो जायेगा।

किसानों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता 

लेकिन इसके लिये सरकारों को इच्छाशक्ति दिखानी होगी। उन्हें प्रशक्षिण के लिए तंत्र बनाने होंगे। जगह शोध संस्थान खोलने होंगे। अधिक विशेषज्ञों की भर्ती करनी होगी। किसानों के लिए काल सेंटर बनाने होंगे। मौसम पूर्वानुमान के लिए सिस्टम बनाने होंगे। किसानों को यह बताना होगा कि किसी जमीन और जमीन के कितने हिस्से में आधुनिक प्रकार की खेती की जा सकती है।

किसानों के कर्ज से जुड़े कुछ आंकड़े 

  • 2016 में उत्तर प्रदेश की सरकार ने 36,359 करोड़ की कर्ज माफी की घोषणा की थी। इससे 2.15 लाख छोटे और सीमांत किसानों का एक लाख तक कर्ज़ माफ करने की घोषणा की गई है।
  • महाराष्ट्र में औसतन हर रोज 3 किसान खुदकुशी कर रहे हैं।
    भारत में हर साल औसतन 12,000 किसान लोन के बोझ की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं।
  • सरकार के अनुसार 2015 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें 8,007 किसान-उत्पादक थे जबकि 4,595 लोग कृषि संबंधी श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे। 2015 में भारत में कुल 1,33,623 आत्महत्याओं में से अपनी जान लेने वाले 9.4 प्रतिशत किसान थे।
  • 2015 में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की जबकि 1,569 आत्महत्याओं के साथ कर्नाटक इस मामले में दूसरे स्थान पर है। इसके बाद तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1,290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) का स्थान आता है। 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 12,360 और 2013 में 11,772 थी।
  • 2010 में कोई भी बड़ा राज्य ऐसा नहीं था, जिसमें किसानों ने आत्महत्याएं नहीं की थीं। तब 3 केंद्र शासित प्रदेशों में किसी किसान की आत्महत्या का मामला सामने नहीं आया था।
  • भारत के किसानों पर कुल कर्ज 15.03 लाख करोड़ रुपये का है। इसमें से 6.25 लाख करोड़ रुपये का कर्ज गैर-संस्थागत स्रोतों से लिया गया था।