Home political news अर्धसैनिक बलों के हकों को हड़पने पर आमादा है नौकरशाहों की लॉबी

अर्धसैनिक बलों के हकों को हड़पने पर आमादा है नौकरशाहों की लॉबी

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जब हमारे देश में किसी बाहरी देश का आकस्मिक आक्रमण होता है तो सबसे पहले दुश्मन से लोहा लेने के लिए कौन सा सशस्त्र बल सामने आता है? जब देश के किसी हिस्से में बाढ़, सुनामी आती है तो सबसे पहले कौन सा बल राहत के लिए पहुंचता है? अगर देश में कहीं भी दंगे भड़कते हैं तो सबसे पहले उन्हें शांत करने के लिए कौन पहुंचता है? जब देश में चुनाव होते हैं तो कौन सा बल उन्हें शांति पूर्वक संपन्न कराने की जिम्मेदारी लेता है? पुलवामा में जो 40 जवान शहीद हुए जिनके बल पर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव 2019 के प्रचार की नींव खड़ी की और देश में राष्ट्रवाद की ज्वाला भड़काई, वे किस बल से संबंधित थे? दोस्तों अगर इसका जवाब आप भारतीय सेना या हमारे पुलिस थानों में तैनात सिविल पुलिस के रूप में समझते हैं तो आप गलत हैं। इसका सही जवाब है, अर्धसैनिक बल। जिन्हें दूसरी भाषा में केंद्रीय पुलिस बल (सीएपीएफ) कहा जाता है।
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  • केंद्रीय पुलिस बलों के अंतर्गत बीएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, आईटीबीपी और सीआईएसएसएफ आते हैं,
  • दोस्तों अगर आप इतना समझ गये हैं तो फिर यह भी जान लीजिये कि हमारी केंद्र सरकार इन बलों का जमकर शोषण और भेदभाव कर रही है और इतना ही नहीं इन्हें अपमानित भी कर रही है।
  • न तो इन बलों के जवानों, अफसरों की शहादत होने पर उन्हें शहीद का दर्ज प्राप्त होता और न ही उन्हें वे वेतन-भत्ते मिलते हैं जो पुलिस/सेना को मिलते हैं।
  • कश्मीर या देश के किसी अन्य हिस्से में आतंकवादियों से लोहा लेते समय मारे जाने पर सरकारी रिकार्ड में इनकी शहादत को एक्सीडेंटल डेथ लिखा जाता है, इन्हें सेना/पुलिस की तरह शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता।
  • और तो और ड्यूटी/सेवा/आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान या किसी गैर आधिकारिक कार्य के दौरान घायल अथवा अपाहिज होने पर इनके जवानों या अफसरों को किसी प्रकार की पेंशन का लाभ नहीं दिया जाता।
  • बेहद काबिल और देश के लिए जी-जान से जुटे इन बलों के अफसर अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से नहीं ले सकते हैं, क्योंकि ये देश की नौकरशाही (आईएएस-आईपीएस) लॉबी के सामने बेबस हैं।
  • अपने ही विभाग में ऊंचे पदों (आईजी रैंक से ऊपर) पर जाने के इनके लिए सभी रास्ते बंद हैं और क्योंकि इससे ऊपर इनके ऊपर राज करने के लिए अफसर भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) से थोपे जाते हैं।
  • ये अफसर मलाईदार पदों पर डेप्यूटेशन पर कुछ समय के लिए आते हैं। दिल्ली में अपने संपर्क सूत्र बेहतर करते हैं, उन सूत्रों का प्रयोग और उच्च पद हासिल करने और ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक लाभ हासिल करने में करते हैं। केंद्रीय पुलिस बलों के अफसरों पर रौब झाड़ते हैं और जब मन भर जाता है तो फिर पुलिस सेवा में लौट जाते हैं।
  • एक तरह से भारतीय पुलिस सेवा के अफसरों ने केंद्रीय पुलिस बल को अपनी आरामगाह, सैरगाह बनाया हुआ है। और ये सब करता है भारत का गृह मंत्रालय।
  • दोस्तों, इससे भी बड़ी बात है कि केंद्रीय पुलिस बल की दुर्दशा और इनके हितों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष फरवरी में एक निर्णय दिया है लेकिन दिल्ली की मजबूत और निरंकुश नौकरशाह लॉबी उस आदेश को भी लागू नहीं होने दे रही है।
  • केंद्रीय पुलिस बल को अपमानित करने और उन्हें हीन बनाये रखने के लिए एक के बाद एक दांव-पेच खेले जा रहे हैं।
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आइए आपको बताते हैं क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के आदेश और क्या चले जा रहे हैं दांव-पेच

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  • इसी वर्ष बीती फरवरी में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रोहिंटन फाली नरिमन और एमआर शाह ने केंद्रीय पुलिस बलों (बीएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, आईटीबीपी और सीआईएसएसएफ) के लिए तत्काल प्रभाव से एनएफएफयू (Non-Functional Financial Upgradation) लागू करने का आदेश दिया था।
  • इसका अर्थ है कि केंद्रीय पुलिस बलों को ग्रुप ए की संगठित सेवाओं का दर्जा दिया जाए और इसी हिसाब से उनके अफसरों और जवानों को मिलने वाले वित्तीय लाभों में सुधार कर दिया जाये।
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भारत सरकार को इस आदेश को 23 अप्रैल, 2019 तक लागू करने और प्रभावित अफसरों को राहत पहुंचाने की समय सीमा निर्धारित कर दी थी।
  • इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने एक सख्त टिप्पणी करते हुए केंद्रीय पुलिस बल में केंद्रीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों को प्रतिबंधित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारत का अर्धसैनिक बल कोई ब्रिटिश राज (औपनिवेशिक) की तरह नहीं है कि इसमें बड़े अफसर राज करने के लिए ब्रिटेन से बुलाये जायेंगे और छोटे पदों पर भारतीय गुलामी करेंगे।
  • लेकिन गृह मंत्रालय ने केंद्रीय पुलिस बलों के अफसरों के अरमानों पर पानी फेरते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर इस आदेश को 15 जुलाई तक टालने की अपील कर दी है।
  • इसके अलावा भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप तय हुए केंद्रीय पुलिस बलों को मिलने वित्तीय लाभों के सुधार और उनके एनएफएफयू दर्जे को टालने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दी है।
  • इस समिति के सभी सदस्य सिविल ब्यूरोक्रेट हैं, इसमें केंद्रीय पुलिस बल के किसी अफसर या विशेषज्ञ को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
  • अब आप सोच सकते हैं कि जिस समिति में प्रत्यक्ष संबंधित पक्ष के प्रतिनिधि को शामिल ही नहीं किया गया है वह केंद्रीय पुलिस बल के पक्ष के हित में क्या सिफारिश देगा।
  • केंद्रीय पुलिस बलों के सूत्रों का कहना है कि यह सुप्रीम कोर्ट को आदेश को टालने की भारत सरकार की एक सोची-समझी चाल है।
  • नौकरशाह लॉबी नहीं चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश लागू हों और इनके अफसरों को भी सम्मान से जीने का हक मिले। अगर ऐसा हुआ तो भारतीय पुलिस सेवा के अफसरों की आरामगार/सैरगाह छिन जायेगी। वे वेतन-भत्तों/सुविधाओं में उनके बराबर आ जायेंगे।
  • दोस्तों देश का सुप्रीम कोर्ट इनकी हालत को अच्छी तरह से समझ रहा है। उसने तमाम आईपीएस और आईएएस संगठनों की याचिकाओं को खारिज करते हुए एक लंबी लड़ाई के बाद केंद्रीय पुलिस बलों के हक में फैसला सुनाया था, लेकिन उच्च स्तरीय समिति और गृह मंत्रालय के हलफनामे ने इनके जख्मों पर नमक छिड़क दिया है।
  • दोस्तों, नरेंद्र मोदी सरकार को यह समझाने का समय आ गया है कि जिन बलों के जवानों की शहादत के बल पर आपने चुनाव जीतने और राष्ट्रवाद का प्रापगैन्ड खड़ा किया है, उनके दर्द को भी समझिये और अपने गृह मंत्रालय को इस तरह की खुराफात करने से रोकिये।
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    modi and amit shah occurs a meeting.