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हरियाणा चुनाव में ‘ट्रेंड सेटर’ बनी बीजेपी

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कभी तीन लालों- बंशीलाल, भजनलाल, देवीलाल के इर्द-गिर्द घूमने वाली हरियाणा की सियायत 2019 के विधानसभा के चुनाव आते-आते जाट और गैर-जाट में बंटी दिखायी दे रही है। जाट पॉलिटिक्स के केन्द्र हरियाणा की सियासी पहचान मौजूदा दौर में काफी हद तक बदल गई है। राज्य के तीनों ‘लाल परिवार’ नेपथ्य में जा चुके हैं और जाट पॉलिटिक्स अपना असर खो चुकी है। 90 सीटों वाला यह राज्य 21 अक्टूबर को अपनी नयी विधानसभा चुनने जा रहा है। ऐसे में यहां बीजेपी बनाम विपक्ष की ताकत की समीक्षा हो रही है।


बीजेपी की ताकत का विपक्ष के पास जवाब नहीं


चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी का विपक्ष के पास तोड़ न के बराबर है। कांग्रेस का अपना असर काफी हद तक खो चुकी है तो क्षेत्रीय दल- इंडियन नेशनल लोकदल और उससे टूटकर निकली जननायक जनता पार्टी दोनों के हालात बुरे हैं। इनेलो जहां अपनी जमीन खो चुकी है वहीं जजपा पांव टिकाने के लिए जमीन तलाशने की कोशिश में हैं।
एक वक्त था जब देवी लाल हरियाणा की राजनीति के सबसे बड़ा ब्रैंड माने जाते थे। उनके बाद उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला ने राजनीतिक विरासत संभाली लेकिन उनके जेल जाने के बाद का जो घटनाक्रम रहा, उसमें उनकी पार्टी उनके पोतों के बीच बंट गई। पारिवारिक कलह का अंजाम ये हुआ कि इनेलो दो हिस्सों में बंट गई। और उसके दोनों हिस्से कमजोर हैं। राज्य चुनाव में उनकी तरफ से बीजेपी को कहीं कोई चुनौती मिलती नहीं दिख रही है।


बीजेपी की रणनीति का तोड़ नहीं


विपक्ष की कमजोरी का फायदा उठाकर बीजेपी ‘अजेंडा सेटर’ बनी हुई है। क्षेत्रीय मुद्दों को एक तरफ रखकर उसने राष्ट्रीय मुद्दों को अपना हथियार बना लिया है। अनुच्छेद 370, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, सिंधु जल प्रस्ताव, पाकिस्तान को मिलने वाला पानी। इन्हीं मुद्दों लेकर बीजेपी के नेता जनता के बीच जा रहे हैं। विडंबना है कि विपक्ष इन मुद्दों के खिलाफ चाहकर कुछ बोल नहीं पा रहा है। विपक्ष की इस मजबूरी का बीजेपी जमकर फायदा उठा रही है। बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व विपक्ष को चुनावी सभाओं में ललकार रहा है कि- ‘अगर कांग्रेस को लगता है कि हमने 370 को हटाकर गलत किया तो वो कहे कि जब वह सत्ता में आएगी तो इसे फिर से लागू कर देगी।’


नेपथ्य में गये क्षेत्रीय मुद्दे


बीजेपी के नेता सिलेंडर की आसान उपलब्धता, अंत्योदय योजना और बीबीसी (भर्ती-बदली-सीएलयू) में पारदर्शिता चर्चा अपने भाषणों में जोरशोस से कर रहे हैं लेकिन बेरोजगारी, किसानों को लागत से ज्यादा फसलों की कीमत, सांप्रदायिक सद्भाव जैसे मुद्दे जिनपर जिस बात होनी चाहिए थी, वह कहीं नहीं हो रही है जबकि ये राज्य के सबसे प्रमुख मुद्दे हैं।


बीजेपी को इसमें कुछ भी गलत नजर नहीं आता


बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव अनिल जैन ने पिछले हफ्ते दिए गए इंटरव्यू में कहा था- अगर सीमा पर सबसे ज्यादा हरियाणा के जवान शहीद हो रहे हैं तो हरियाणा में पाकिस्तान की भी चर्चा होगी और कश्मीर की भी, इसमें कुछ भी गलत नहीं। उधर, कांग्रेस इसे दूसरे नजरिये से देख रही है। उसका कहना है कि ‘बीजेपी की यह चाल है, स्थानीय मुद्दों पर कोई बात न हो, इसलिए वह पाकिस्तान, कश्मीर, तीन तलाक पर बात कर रही है’।


बाहर से ज्यादा अंदर की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस


राज्य के अंदर खेमों-पालों में बिखरी कांग्रेस बाहर से ज्यादा अंदर की लड़ाई लड़ रही है। चुनाव के ठीक पहले पार्टी छोड़ने की धमकी देकर हुड्डा ने अपनी शर्त तो मनवा ली लेकिन उसकी कीमत पार्टी को अशोक तंवर को गंवाकर चुकानी पड़ी। हरियाणा जैसे एक छोटे से राज्य में कांग्रेस जितने गुटों-पालों में बंटी है, उतना किसी भी अन्य राज्य में नहीं।


जाट राजनीति को निष्प्रभावी करने की सटीक रणनीति


हरियाणा की राजनीति में जाटों का वर्चस्व रहा है लेकिन पिछली बार बीजेपी ने बहुमत मिलने पर किसी जाट नेता की बजाय गैर जाट नेता मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाने का दांव खेला। बीजेपी के लोग खट्टर सरकार की भर्ती-बदली प्रक्रिया में पारदर्शिता को मुद्दा बना रहे हैं, उसके पीछे मकसद गैर जाटों को यह याद कराना ही है कि यह वही हरियाणा है जहां पहले सरकारी नौकरियों में भर्ती और मनचाही जगह पोस्टिंग में सिर्फ जाटों की ही सुनी जाती थी लेकिन हमारी सरकार ने इस पूरे सिस्टम को पलट दिया।


अस्तिव की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस और हुड्डा


हुड्डा की पूरी कोशिश इसी आधार पर जाट कम्युनिटी को गोलबंद करने की है कि ‘अगर इस बार भी खट्टर की वापसी हो गई तो उन लोगों का वजूद बिल्कुल खत्म हो जाएगा। इसलिए राजनीतिक ताकत जाटों को अपने हाथ मे रखनी चाहिए।’ हुड्डा ही सबसे बड़े जाट नेता माने जा रहे हैं लेकिन यह याद रखने की बात है कि अभी पांच महीने पहले लोकसभा के चुनाव में जाट समुदाय ने बीजेपी को वोट किया था। लेकिन कांग्रेस के कुछ नेता कहते हैं कि वह चुनाव मोदी का था। विधानसभा के चुनाव में वोटर्स का नजरिया बदला होता है।